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दीपावली पर विशेष व्यंग्य-कथाः आलू-प्याज’ जांच समिति-वीरेंद्र देवांगना

दीपावली पर विशेष व्यंग्य-कथाः
आलू-प्याज’ जांच समिति
जब दीपावली पर्व पर आलू-प्याज के दाम मनमाने बढ़ने लगे और कालाबाजारी व जमाखोरी की खबर समाचारपत्रों में सुर्खिंयां बटोरने लगी, तब कलेक्टर ने ‘आलू-प्याज’ जांच समिति का गठन किया।
अनुविभागीय अधिकारी (रा) समिति के अध्यक्ष, तहसीलदार-सदस्य व खाद्य अधिकारी-सदस्य सचिव बनाए गए। समिति को सात दिवस में जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के शख्त निर्देश मिले।
जांच आदेश मिलने पर समिति के सदस्यों की बांछे खिल उठी,‘बड़े साहब हो, तो ऐसा!’ जिन्होंने आनन-फानन में महंगे आलू-प्याज को उनके लिए फ्री कर दिया।’
अब, वे जांच के बहाने कभी इस दुकान, तो कभी उस दुकान जाने लगे और रिकार्ड, स्टाक व गोदाम की जांच करते हुए अपने घरों के लिए आलू-प्याज का बंदोबस्त करने लगे।
जांच अधिकारियों का कहना था कि वे जिंदगीभर जितना आलू-प्याज नहीं खरीदे थे, उतना सात दिनों में बटोर लिए। अब, सालभर नहीं खरीदेंगे, तो भी काम चल जाएगा।
एक दिन खाद्य अधिकारी ने एसडीएम व तहसीलदार को आलू-प्याज की जमाखोरी का गणित समझाते हुए कहा, ‘‘सर, जब किसान लागत मूल्य न मिलने से व्यथित होकर आलू-प्याज सड़कों पर फंेकने लगते हैं, तब 1 रुपये किलो के भाव कालाबाजारिए खरीद लेते हैं। फिर मौसम में 100-50 रुपये किलो बेचते हैं। इस तरह वे सिर्फ 5-6 माह में 50 गुना से अधिक इनकम कर लेते हैं। यह मुनाफाखोरी है, सर। टैक्स भी नहीं देते और 50 गुना अधिक सोटते हैं। मैं बतौर सबूत (पीके मरे की ओर देखकर) कई किसान बता सकता हूं, जो जमाखोरों को 1 रुपया किलो में सैकड़ों क्विंटल आलू बेच चुके हैं।’’
‘‘मेरे रहते ऐसी अंधेरगर्दी! कल इनकी मीटिंग बुलाओ। बड़े साहब को भी सूचित करो। देखता हूूं मैं, ये मेरे फंदे से कैसे बच निकलते हैं?’’ एसडीएम ने मूछों पर ताव देते हुए कहा।
मीटिंग में कलेक्टर ने डरे-सहमे जमाखोरों को हिकारत से देखते हुए फटकारा,‘‘कितना अंधेर मचा रखा है तुमलोगो ने? 1 रुपये किलो के आलू-प्याज को 50 रुपए किलो में बेचते हो और हमें बेवकूफ समझते हो। शर्म नहीं आती मुनाफाखोरी करते हुए!’’
इनमें से एक जरा पढ़ा-लिखा था और अपने-आप को लीडर समझता था। साहस बटोरकर बोला,‘‘सर, आप बोले तो हम 40 रुपए किलो दे सकते हैं। पर गोदाम का किराया, सड़े-गले की हानि, चूहे की नुकसानी, दीमक की परेशानी, बिजली-पानी, नौकर-चाकर का दानापानी को जोड़कर हमें भी तो बचना चाहिए। हमारे बाल-बच्चे भी हैं माईबाप। घोड़ा धांस से दोस्ती करेगा, तो खाएगा क्या?’’
एसडीएम को यह तर्क नागवार गुजरा। ये मुंह और मसूर की दाल! ये लोग हमे ‘बिना लिए-दिए’ चांदी कूट रहे हैं और सहानुभूति बटोरने के लिए दर्द बयां कर रहे हैं।
बोला,‘‘तुमलोग अवैध कमाई में लगे हो। एक रुपए के माल को पचास रुपए में बेचकर एक सीजन में लाखों कमा रहे हो। ऊपर से सरकार को फूटी कौड़ी नहीं देकर हमें बेवकूफ समझते हो। हमारे सामने बाल-बच्चों का रोना रोते हो।’’
यह कैसे संभव था कि कलेक्टर की मीटिंग में एसडीएम बढ़त बनाए और ज्ञान बधारंे? कलेक्टर ने फौरन चर्चा की लगाम अपने हाथ में थामते हुए कहा,‘‘सौ बात की एक बात! मैं ये धांधली नहीं चलने दूंगा। हमें भी ऊपर जवाब देना पड़ता है।’’
उन्होंने एसडीएम साहब की ओर मुखातिब होते हुए आदेश फरमाया,‘‘एसडीएम! इस मीटिंग के बाद जमाखोरों की दुकानें सील करो और मुझे रिपोर्ट सौंपो। मैं देखता हूं कि ये मेरे रहते कैसे लूटपाट मचाते हैं?’’
कलेक्टर का मूंड आफ देखकर मीटिंग हाल में सन्नाटा छा गया। सबकी बोलती बंद। कोई बोले, तो क्या बोले। वे जिले के शेर होते हैं, शेर! उनका दिमाग खराब होना, मतलब किसी पर गाज गिरना तय समझा जाता है।
कलेक्टर का गुस्सा देखकर खाद्य अधिकारी विनम्रता का चादर ओढ़कर बोल़ा,‘‘सर, एक रिक्वेस्ट है।’’
‘‘क्या है? जल्दी बोलो। मुझे और भी काम है।’’
‘‘सर, इन्हें इस बार सुधरने का मौका दे देते हैं। आगे ऐसी बदमाशी करेंगे, तो ये अपना गुनाह खुद भुगतेंगे।’’ खाद्य अधिकारी ने आंखो से सुलह का इशारा करते हुए लगभग विनती के अंदाज में कहा, तो कलेक्टर को लगा कि खाद्य अधिकारी के निवेदन में अपना फायदा हो सकता है।
इस प्रकार मीटिंग बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गया। मुनाफाखोर फिर से अपना व्यापार करने लगे। समिति छापेमारी में लग गई।
रात को कलेक्टर साहब ने कमेटी की राय से एक फार्मूला निकाला कि व्यापारी आलू-प्याज 50 की बजाय 25 रुपए किलो में बेचेंगे। इससे उपभोक्ता पर बोझ भी नहीं पड़ेगा और व्यवसायी घाटे में भी नहीं रहंेगे।
बेचे गए 25 रुपये में-से वे 10 रुपया प्रशासनिक खर्चे के लिए कलेक्टर कोष में जमा करेंगे, बाकी 15 रुपया अपने लिए रखेंगे। यह देखना कमेटी का काम होगा। यह पैसा अधिकारियों की मीटिंग, शिविर, सेमीनार के दौरान चाय-नाश्ते के व्यय पर काम आएगा। यह आफ रिकार्ड एक्पेंडिचर रहेगा, जिसमें वारे-न्यारे की गंुजाइश बनी रहेगी।
ऊपर से प्रशासनिक नियंत्रण व दबदबा भी कायम रहेगा। लोग प्रशासन का ख्याल रखकर धंधा-पानी करेंगे, तो सबकी बरकत होगी। आखिर बाल-बच्चे सबके हैं।
पीके मरे भी एक किसान की हैसियत से उस मीटिंग में मौजूद था, लेकिन उससे कुछ नहीं पूछा गया, तो उसने कुछ नहीं कहा। लेकिन, उसका कलेजा फट गया, जो एक रुपए किलो में आलू-प्याज बेच चुका था।
उसे यह जानकर बेहद दुःख हुआ कि जिनका खेती-किसानी से दूर-दूर तक नाता नहीं है, वे किसानों के उत्पाद से माल बटोर रहे हैं और वास्तविक किसान लागत मूल्य न मिलने से कीटनाशक खाकर मौत को गले लगा रहे हैं।
कुछ महीनों बाद पता चला कि कलेक्टर साहब को आलू-प्याज के कारोबार पर खासा नियंत्रण स्थापित करने के लिए राज्य की ओर से ‘आलू-प्याज शिरोमणी एवार्ड’ से सम्मानित किया गया है, तो कमेटी की प्रसन्नता का पारावार न रहा।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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