आखिर सत्य -हेमा पांडे

आखिर सत्य -हेमा पांडे

एक बार सुकरात अपने शिष्यों को ज्ञान दे रहे थे और उनकी जिज्ञासाओं का समाधान भी कर रहे थे, जब वे अपनी बात समाप्त कर चुके थे, तो उन्होंने अपने शिष्यों से कहा यदि किसी के मन में अब भी कोई संशय या प्रश्न शेष हो तो वह पूछ सकता है, यह सुनकर एक शिष्य ने जो उनके पास काफी समय से रह रहा था, और अपने आप को काफी ज्ञानवान समझने लगा था, उसने कहा गुरु जी आप मुझे बताइए चांद में धब्बा क्यों है, मैं यह भी जानना चाहता हूं, कि दीपक के नीचे अंधेरा क्यों होता है, जब सुकरात ने इन प्रश्नों को सुना तो वह अत्यंत व्यथित हो गए और दुखी मन से कहा तुम्हें मेरे पास रहते इतना समय हो गया, लेकिन अभी भी तुम ज्ञान की पहली सीढ़ी पर अटके हुए हो, यह सुन कर वह शिष्य अत्यंत दुखी हुआ, उसे ऐसी किसी टिप्पणी की अपेक्षा नहीं थी, वह अपने आपको काफी ज्ञानवान मानता था. अतः इससे उसके को भी ठेस पहुंची, उसने सुकरात से कहा- मैं इतने समय से आपसे ज्ञान अर्जित कर रहा हूं, फिर भी आपने यह क्यों कहा कि मैं अभी ज्ञान की पहली सीढ़ी पर थका हुआ हूं, आपके इन शब्दों से मुझे अत्यंत दुख पहुंचा है, सुकरात ने जवाब दिया- मुझे भी तुम्हारे सवाल से बहुत दुख पहुंचा है, सुकरात ने जवाब दिया मुझे भी तुम्हारे सवाल से बहुत दुख पहुंचा है, काश कि तुमने पूछा होता चांद में चांदनी क्यों है, दीपक में इतनी रोशनी क्यों है, फिर मैं तुम्हें जीवन के अत्यंत रहस्य में से कुछ मोती चुन कर देता फिर मैं तुम्हें बताता कि जीवन क्या होता है. जीवन का अर्थ क्या है, क्योंकि जब तुम किसी की बुराइयों पर ध्यान देते हो, बुराइयों पर चिंतन करते हो तो जाने अनजाने में ही उन बुराइयों के कुछ अंश अपने अंदर उतार लेते हो और फल स्वरुप तुम्हारे अंदर बुराइयां बढ़ती जाती है, और जब तुम किसी की अच्छाइयों पर ध्यान देते हो, अच्छाइयों का चिंतन करते हो, तो फिर तुम्हारे अंदर अच्छाइयों में वृद्धि होती है.. …..

 

            

हेमा पांडे

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