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बेटी की पुकार-रेखा-शर्मा

मैंने भी बुने थे सपने अपार।
​मुझ में भी थी महतवाकांक्षाएं हजार।।

​सोचा था पढूंगी- लिखूंगी,
​मां पिताजी की सहारा बनूंगी,
​पर टूट गए सपने,
​और हो गई दरिंदगी की शिकार,
​ मैंने भी बुने थे सपने अपार।।

​पिताजी से कहा करती थी,
​पढ़-लिख कर अफसर बनूंगी,
​आप का नाम रौशन करुंगी,
​पर रास ना आई उन हैवानों को मेरी यह बात,
​मैंने भी बुने थे सपने अपार।।

​नहीं पढ़ पाई,
​और ना कर पाई अपने सपनों को साकार,
​ मर गई मेरी महतवाकांक्षाएं,
​और डह गया मेरे सपनों का संसार।।
​​मैंने भी बुने थे सपने अपार,

​​क्यों हर बार सहना पढ़ता है मुझे,
​ना चीख सकी ना भाग सकी,
​क्या कुसूर यही था मेरा​ की मैं किसी की बेटी या बहन हूं,
​या मेरा जन्म लेना ही है बेकार ,
​मैंने भी बुने थे सपने अपार।।

​अपनी तो नहीं है यह सोच कर जाने दिया जाता है हर बार,
​पर ​क्या पता अपनो की ही बारी आ जाए इस बार,
​इसलिए जो मैंने सहा वो किसी और को ना सहने दीजिए अब की बार..🙏🙏😭

​मै भी बुने थे सपने अपार
​मुझ में भी थी महतवाकांक्षाएं हजार..!!
​®️Sharma….🖋️

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