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चेतना-संतोष कुमार कोली

Translate from: Hindi19/5000संतोष कुमार कोली

तेरा राम तेरे, मन मंदिर में ही करे निवास।
कस्तूरी मृग ज्यों,क्यों ढूॅऺढ़े जंगल में घास?
इसको ही तू पूज ले, क्यों मंदिर मसजिद जाता?
तेरा ईश्वर तुझमें, क्यों दर -दर ठोकर खाता?
बिना तेल बाती के इसमें, जलते लाखों दीपक।
अमर ज्योतिर्मय पुंज है, ॳॅधेरे में क्यों रहा भटक?
यही जोत पहचान ले, क्यों झूठा दीप जलाता?
तेरा ईश्वर तुझमें, क्यों दर- दर ठोकर खाता?
पहचान, तुझमें सागर भरा अनंत अनोखा।
जल में रहकर भी तू क्यों, है सूखा का सूखा?
इसमें ही डुबकी लगा ले, क्यों गंगा- यमुना नहाता?
तेरा ईश्वर तुझमें, क्यों दर- दर ठोकर खाता?
तेरी सुंदर काया में,बसे हैं चारों धाम।
इसमें ही मिल जाएंगे, तुझको सीता -राम।
सभी तीर्थ इसमें ही हैं,क्यों घूमे काॅऺवर फिराता?
तेरा ईश्वर तुझमें, क्यों दर- दर ठोकर खाता?
रत्नख़ज़ाना जिसको, कोई नहीं सकता है छीन।
अनंत ख़ज़ाने का मालिक होकर, है दीन का दीन।
कह संतोष ख़ज़ाने को, कोई विरला नर ही पाता।
तेरा ईश्वर तुझमें, क्यों दर -दर ठोकर खाता?

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