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तुम्ही ढूँढ लेना-रेनू कुशवाहा

ये कविता लिखते समय एक अजीब सी ग्लानि हुई. क्योकि किसी के लिए ये कविता का विषय हो सकता है पर किसी के लिए जीवन भर ना ख़त्म होने वाली पीड़ा है. वो हर परिवार इस पीड़ा को रोज सुबह उठते ही भोगते है और हर पल जीवन भर भोगेंगे. घटना चाहे हाथरस की हो या कही और की पीड़ित को दोषी बनाना अपने यहाँ आम बात है.
इस कविता के माध्यम से पीड़िता की ओर से एक प्रश्न है इन समाज के लोगो से-

किसी की आज़ादी लगी तुमको अच्छी
किसी को पहनाई गर्दन दबाती ये रस्सी
कस देना फिर से ढीली पड़ने लगे जो
रस्सी छुड़ाने को कोई लड़ने लगे जो
रत्ती भर नहीं उस औरत का मान
कराये जो ये उपर्युक्त ज्ञान
ऐसे ही विद्वान तुम्ही ढूढ़ लेना

लौट आना उस जगह से
लेकर के अपनी अपनी कहानी
बहुतों को पड़ेगी तुम सबको सुनानी
करो ना बचाने की कोशिश
मैं ही हूँ दोषी
होती ना ये गति सच्ची जो होती
पर कैसे कटी होगी मेरी जुबान
मिल पाए अगर कोई निशान
तुम्ही ढूढ़ लेना

मेरे घरवाले करते होंगे अभी भी
रोज़मर्रा के काम सारे
सूख ही जाएंगे एक दिन
आँखों के किनारे
पर हर एक कदम पर
मैं साथ चलती तो होंगी
सुबह उठते ही सबसे पहले
मैं मिलती तो होंगी
ग़ायब कहाँ है मेरे अपनों की मुस्कान
ये तुम्ही ढूढ़ लेना

बहुत ही आसान है चिता को बनाना
बस कुछ लकड़ी कंडे पड़ेगे जुटाना
जो किवाड़ों के पीछे है दोषी है सारे
तुम ही दो मुखाग्नि ये हक़ है तुम्हारे
जलाना पड़े जो खुद के घरों की कोई जान
तो बिल्कुल ऐसा ही शमशान
तुम्ही ढूढ़ लेना.

1 thought on “तुम्ही ढूँढ लेना-रेनू कुशवाहा”

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