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जागो और अपने आप को पहचानो-प्रिंस स्प्तिवारी

मैंने सुना है कि एक आदमी ने एक बहुत सुंदर बगीचा लगाया। लेकिन एक अड़चन शुरू हो गई। कोई रात में आकर बगीचे के वृक्ष तोड़ जाता, पौधे उखाड़ जाता। सुबह सारा बगीचा आधी उजड़ी हालत में आ जाता। शक हुआ कि पड़ोसी शरारत कर रहे हैं।र् ईष्या हो गई है। उसने आदमी रखे, जासूस लगाए। लेकिन पता चला, कोई पड़ोसी कोई गड़बड़ नहीं कर रहा है। कोई आता नहीं।

तब तो बड़ी मुश्किल हो गई। तो उसे शक हुआ कि शायद भूत-प्रेत, शायद कोई दुष्टात्माएं उपद्रव कर रही हैं। उसने गंडेत्ताबीज बंधवाए।

कुछ भी परिणाम न हुआ। भूत-प्रेतों का काम जारी रहा।

तब वह घबड़ा गया। एक फकीर गांव में आया था, वह उसके पास गया। उसने कहा, मैं बड़ी मुश्किल में आ गया हूं। अपनी सारी कथा सुनाई।

उस फकीर ने कहा, तू एक काम कर। ठीक आधी रात का अलार्म अपनी घड़ी में भर दे। और सात दिन तक जब अलार्म बजे तो जाग कर, पांच मिनट जाग कर अपने आस-पास देखना और सो जाना। सात दिन में कोई घटना तुझे दिखाई पड़े तो मेरे पास आ जाना।

उसे कुछ भरोसा न आया कि अलार्म इसमें क्या करेगा! मेरा जागना इसमें क्या करेगा!

लेकिन अब फकीर ने कहा है तो सात दिन की ही बात है, कर ही लेनी चाहिए। और सब उपाय कर ही चुके हैं, कुछ हुआ नहीं। अलार्म भर कर घड़ी में सो गया। दो दिन तो कुछ भी न हुआ। व्यर्थ नींद टूटी। नाराज भी हुआ। फकीर को गाली भी दी मन में। लेकिन तीसरे दिन उसने पाया कि जब अलार्म बजा तो वह बगीचे में खड़ा नींद में अपने झाड़ उखाड़ रहा था।

भागा हुआ फकीर के चरणों में गिर गया। उसने कहा कि तुम अगर मुझे न जगाते तो मैं न मालूम और कितने उपाय करता। वे सब उपाय व्यर्थ थे। क्योंकि कोई दूसरा हानि नहीं पहुंचा रहा था। मैं ही अपनी नींद में अपने वृक्षों को उखाड़ रहा था।

और ऐसी ही दशा प्रत्येक की है। कोई तुम्हें दुख नहीं पहुंचा रहा है। कोई तुम्हारी बगिया नहीं उजाड़ रहा है। न तो पड़ोसी नष्ट कर रहे हैं, न कोई भूत-प्रेत तुम्हें सता रहे हैं। तुम ही अपनी नींद में अपनी जीवन की बगिया को उजाड़ते हो, दुख पाते हो, पीड़ा पाते हो। नींद टूटनी चाहिए।

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