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रात का सफर-सुनील कुमार शर्मा

घसीटे और रलदु ने जब अंग्रेजी की पूरी बोतल खाली कर दी, तो घसीटा बोला, “रलदु यार! रात काफी हो चुकी है, चल मैं तुझे तेरे घर छोड़ आता हूँ। ” फिर दोनों उठकर लडख़ड़ाते कदमो से दो मील दूर रलदु के गांव की तरफ चल दिए।
रलदु के घर पहुंचने के बाद ज़ब घसीटा वापिस चलने लगा तो यह कहते हुए, “यार घसीटे ! तूने पी रखी है….. सौ बात हो सकती है…… मैं तुझे अकेला नहीं जाने दूंगा….। “रलदु, घसीटे के साथ चल पड़ा। फिर दोनों वापिस घसीटे के घर पहुंच गए पर बात यहां पर भी खत्म नहीं हुई। फिर ज़ब रलदु अपने घर जाने लगा तो घसीटा उसका हाथ पकडकर बोला, “…..मैं भी इस हालत मे तुझे अकेले घर नहीं जाने दूंगा… । “फिर दोनों बहस करते हुए रलदू के घर की तरफ चल पढ़े। इसी प्रकार वे सारी रात एक -दूसरे को घर पहुँचाते रहे। ज़ब प्रातः चार बजे मंदिर की घण्टियाँ बजी, दोनों का नशा उतर चुका था। थके -हारे दोनों, रलदु के घास – फूस वाले कोठे मे पड़ी टूटी हुई चारपाई पर ढेर हो गए ;क्योंकि खटखटाने पर भी रलदु की पत्नी ने घर की कुण्डी नहीं खोली थी। प्रातः आठ बजे रलदु के एक साथी सुरजे ने रलदु को उठाने की कोशिश की,”रलदु यार !उठो दिहाड़ी का समय हो गया है। ”
रलदु बिना आँखे खोले बोला , “मैं आज दिहाड़ी पर नहीं जा सकता। ”
“क्यों? ” सुरजे ने पूछा।
“…..यार ! रात के सफर ने मार दिया। ” यह कहकर रलदु ने करवट बदल ली।
सुनील कुमार शर्मा

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