सत्ता... (कविता )
1.कागज छुती न कलम उठाती,है इसे कुर्सी पर बैठे रहने की बिमारी,
2.हां...है अंधी ,गूंगी, बहरी और लंगङी,है इसे गाङी पर बैठे रहन� read more >>
(कविता) बेरोजगार की आवाज ....
गांव गली शहरो मे चर्चे आम हो जाए,
सत्ता धारी द्वार खोले तो हम तेरे हो जाए,
तुम्ही हो भाषण, तुम्ही हो ताली,
त� read more >>
कविता (यार मेरे ...)
किस दौङ मे लग गए ना जाने दिनरात मेरे,
अपनी चाहत को दुनिया की नजर खा गयी सारी,
किस ख्वाब मे सिमट कर रह गए सुबह-शाम मेरे... read more >>
कविता -(पैर कब्र मे हैं लेकिन इस प्यार की कोई उम्र नहीं )
पैर कब्र हैं लेकिन इस प्यार की कोई उम्र नहीं
अनंत आकाश की तरह हैं,
दूर तक ज� read more >>