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मन की पहचान – 2 – दिलबाग सिंह

(परवरिश मन की)
    भाग _2

अब तक….. शांति पाने के लिए हम सब कहाँ – कहाँ भटकते फिरते हैं!
अब आगे……. अब सवाल ये है! शांति चाहिए किसको?
मन को! क्योंकि हमारा मन ही अशांत होता है! और जब मन अशांत होता है हमें पुरी दुनिया अशांत लगने लगती है!
यहाँ तक हमारा अपना शरीर भी बेजान सा मालूम पड़ता है!
ऐसे में मन को कमजोर देखकर क्रोध हमारे  मन पर हावी हो जाता है!
कोई हमें समझाने की कोशिश करे तो हमें वो हमारा दुश्मन नजर आता है!
अगर अशांत मन को कोई कह दे कि शांत हो जा सब ठीक हो जायेगा! तो उसकी अशांति और बढ़ जाती है!
अशांत मन अपना भला – बुरा  सोचने में असमर्थ होता है!
अशांत मन अपना तो नुकसान करता ही है! दुसरो का भी नुकसान कर बैठता है!
अशांत मन कभी – कभी इस तन को खत्म करने की सोचता है!

ऐसे में खुद ही हम खुद के मददगार बन सकते हैं! वो कैसे!
सबसे पहले तो यह समझने की कोशिश किजिए कि जो अशांत है वह कौन है!
यानि कहते हैं! ‘ मैं’ अशांत हूँ! यह ‘ मै’  कहने वाला कौन है!
जिन होठों से या मुंह से ‘ मै ‘ बोला गया है वह मुंह तो एक शरीर का अंग है!! मगर बोलने वाला ‘कौन’ है!
ये ‘ मै’ बोलने वाली एक शक्ति है!
जो हमारे तन रूपी कपड़े को पहन कर इस संसार में अपना रोल अदा करती है!
हम सिर्फ वह तन रूपी कपड़ा ही इन आँखों से देख सकते हैं! मगर वह शक्ति जो इस कपड़े को चला रही है! उसे इन आँखों से नहीं देख सकते!
इन आँखों से हम सिर्फ जिन चिजों का आकार होता है! उन्हें ही देख सकते हैं! वह शक्ति निराकार है, जिसे  सिर्फ महसूस किया जाता है! देखा नहीं जाता! जैसे हवा है! हवा को कभी देखा नहीं जाता सिर्फ महसूस किया जाता है!’
निराकार ‘चिजों को महसूस अपने अंदर की आंखों से किया जाता है! बाहरी आंखें सिर्फ आकार को पकडती है!

जैसे – क्रोध, प्यार, नफरत, घंमड, लोभ, ममता, डर, चिंता, आदि
इन सबको हम सिर्फ महसूस करते हैं! लेकिन देख नहीं सकते! क्योंकि ये सब हमारे मन में विधमान है और जो चिज हमारे मन में रहते हैं! भला उसे बाहरी चिजों से कैसे जाना जाता है!

बाहरी चिजों को बाहरी शरीर की अंगों द्वारा जाना जाता है। और ठीक किया जाता है। मन की बिगडी़ चिजों को मन के द्वारा ही ठीक किया जाता है!
जो ‘शक्ति’ हमारे शरीर को चला रही है! उसे संसारी भाषा में आत्मा कहते हैं!
आप कहोगे ये तो सब जानते हैं! जानते सब है पर मानते क्यों नहीं! क्यो जानते हुए भी इस शरीर कि ही सुंदरता बढाने में लगे हुए है।
इस शरीर को ही अहमियत देते रहते हैं! जैसे किसी का शरीर काले रंग का बदसूरत सा है! तो उसे देखते ही हम कहेंगे! कितना बदसूरत आदमी है! कई तो उसे छूने से डरेंगे! ऐसा क्यों!

क्योंकि हमारी बाहरी नजर सिर्फ उसके शरीर तक सीमित है! इसलिए अगर हम जानते हैं कि ये काला बदसूरत शरीर एक सबसे सुंदर ,सबसे पवित्र , सबसे शक्तिशाली, सबसे शीतल, आत्मा का एक कपडा है तो क्या हम उससे नफरत कर सकेंगे! नहीं ना!

इसका एक ही कारण है! हमारा मन! हमारे शरीर को चलाने वाली जो शक्ति है! उसकी दो शक्ति है! मन और बुद्धि।
‘ मन’ जो हम विचार करते हैं। उसे ‘ मन’ कहते हैं! और उन विचारों को ‘ सही’  है या ‘ गलत’ है!ये निर्णय हमारी बुद्धि करती है! और फिर विचार करके ‘सही’ ‘ गलत’ का निर्णय करके जो हम कर्म करते हैं! उसे संस्कार कहते हैं!
इसलिए तो कहा जाता है! सोच विचार कर कर्म करो! ताकि बाद में पछताना ना पड़े!
अपने आपको जानने के लिए सबसे पहले मन को समझना पडेगा !
मन हमें उस शक्ति तक नहीं पहुचने देता क्योंकि उसे डर है कि उसकी हुकूमत कम हो जायेगी!
जो शरीर रूपी कपड़ा हम पहनकर इस संसार में आते हैं! मन उसे अपनी और खिंच खिंच कर इतना टाइट कर देता है! जिसे उतारना हमें मुश्किल सी लगता है। और हम उसमें ही फंस कर रह जाते हैं!

शरीर रूपी कपड़े को ढीला करने के लिए हमें मन की पकड़ को ढीला करना पडेगा! तभी हम अपने असली स्वरूप तक पहुँच सकते हैं।
उसके लिए पहले मन को समझना पडेगा! फिर कंट्रोल करना पडेगा। फिर उसे नष्ट करना पडेगा।
उसके लिए क्या करे…………..

आगे अगले भाग में
कविता केशव

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