बरसो रे – राजपुत कमलेश “कमल”

बरसो रे – राजपुत कमलेश “कमल”

बरसो रे. . . . . बरसो रे. . . . , प्रेम सुधा बरसो रे! -२ धानी चुनरिया मोहे ओढा कर, प्रित के रङ में उसको रङाकर, प्रेम से हरशो रे!! बरसो रे. . . . . बरसो रे. . . . , प्रेम सुधा बरसो रे! मधुर सुरा का जाम बनाकर, इन अधरो
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प्रवीण जन – राजपुत कमलेश ” कमल “

🌺 प्रवीण जन 🌺 सरल स्वभाव दिखता हो जिसका हो जिसमे सज्जनता भाव! शीश झुकाये उस मनु तन को हो जिसमे समता का भाव!! प्रवीण जन देखते है ऐसे कमल पुष्प पन्खुडी के जैसे! हो मिठास जिह्वा में जिन्की जो कर दे इस मन को साफ!! जो सिखलाते धर्म राह और सत्य अहिन्शा का प्रवाह!
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माँ – राजपुत कमलेश “कमल “

🌳🌺माँ……!🌺🌳 माँ……! माँ पर्मेश्वर का साक्शात्कार है!! माँ……! माँ रेगिस्तान में बहेता मीठा झरना है!! माँ……! माँ सुबह का पहेला कलेवा है!! माँ…..! माँ कुदरत का दिया अनमोल तोहफा है!! माँ…..! माँ तपती धूप में शीतल नीम की छाओ है!! माँ…..! माँ ममत्व का सच्चा प्रमाड है!! माँ…..! माँ आत्मा से निकली निर्मल पुकार है!!
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स्वार्थ – राजपुत कमलेश ” कमल “

क्या कहे किससे कहे, अब कहा जाता नही! जो दर्द होता है हृदय में, अब सहा जाता नही!! है कौन जन जो इस जहाँ में, नि:स्वार्थ बन कर है जिया! स्वार्थी हर जन यहाँ के, स्वार्थ सब में है बसा!! स्वार्थ के कारण ही बेटा, बाप हमको है कहे!! स्वार्थ के कारण ही पत्नी, नाथ
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दिवाने ख़ास आए है! – राजपुत कमलेश “कमल”

दिवाने ख़ास आए है! 💞 मैकजे खोल दे साकी, दिवाने ख़ास आए है! तेरी आँखों से जो छलके, वो पीने जाम आए है!! तमन्ना रह गयी आधी, अधुरे ख्वाब आए है! जो जलकर जल नही पाये, वही चराग आए है!! मैकजे खोल दे साकी, दिवाने ख़ास आए है! कभी पुरा नही है जो, वो टुटा
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जुगनु सा चमके जाता हूँ! – राजपुत कमलेश ” कमल “

मावस की काली रातो में, जुगनु सा चमके जाता हूँ! हर अनुभव की मोती माला, मै हाथ पिरोये जाता हूँ!! प्रेम भरा विष का प्याला, मै उसे घोल पी जाता हूँ!!! मावस की काली रातो में, मै जुगनु सा चमके जाता हूँ! विडम्बना के अम्बर पर, मै पन्छी बन उड जाता हूँ!! ऑर छीन रोशनी
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दिले हसरत – राजपुत कमलेश “कमल”

दिले हसरत मेरी ख्वाबो में, बया कर लेने दे! दो घड़ी ही सही दामन तेरा, छू लेने दे! मुद्दतो से नही महेकी, मेरे प्यार कि बगीया, आज उसे खुल के गमक लेने दे! खयालो में ही नजर आता रहा, चेहरा तेरा अब उसी चेहरे को, तरास लेने दे! हरेक शहर की गलियो में, तलसता रहा
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कविता – राजपुत कमलेश “कमल”

भोर भई जब आन्खे खोली, मन्द-मन्द मुस्काइ कविता! कल्पनाओ के कल्प तरू से, सुनहले अक्शर लाइ कविता!! हृदय सिन्धु के मन मन्थन से, अम्रुत रस ले आई कविता! भोर भई जब आन्खे खोली, मन्द-मन्द मुस्काइ कविता!! नभचर के कलरव में जाकर, छन्द-छन्द बन आई कविता! शिवालयो के घन्टनाद में, टन्न-टन्न गोहराइ कविता!! कर्म योगी के
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