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बैंक जमा पर अहितकारी बीमा कवर-वीरेंद्र देवांगना

बैंक जमा पर अहितकारी बीमा कवर
पंजाब एंड महाराष्ट्र कोआॅपरेटिव (पीएमसी) बैंक के कामकाज पर धोखाघड़ी के चलते रिजर्व बैंक ने रोक लगा दी है। हजारों-लाखों जमाकर्ता चिंतित हैं कि उनकी बचत का क्या होगा? वह बचत, जिसमें हाड़तोड़ व खूनपसीने की कमाई शामिल है।
वे अब पश्चाताप करने लगे हैं कि इससे तो अच्छा होता कि वे अपनी कमाई को बुजुर्गों की तरह बक्से में बंद कर रखते, जमीन के नीचे गाड़ देते, रजाई में डाल कर रखते। पलंग व दीवान में दबाकर रखते।
ऐसे लुंजपुंज बैंकिंगतंत्र का क्या फायदा, जो लोकधन को सुरक्षित रख नहीं सकता? इससे तो अच्छा था कि इंसान उसके पाई-पाई का हिसाब घर में रख लेता। बैंकिंग झांसे के चलते अब पाई-पाई की भरपाई कौन करेगा? आदि-आदि।
जमा राशि का बीमाः आरबीआई की पूर्ण स्वामित्ववाली संस्था डिपोजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कारपोरेशन (डीआइसीजीसी) के द्वारा प्रत्येक जमाकर्ता के वाणिज्यिक बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, लोकल एरिया बैंकों और कोआपरेटिव बैंकों के खातों में एक लाख रुपया जमा पर इंश्योरंेस कवर मुहैया करवाती है। बैंकों के फेल होने पर बाकी जमा जब्त मानी जाती है।
डीआइसीजीसी यह बेतुका बीमा नियम 1980 में 30 हजार रुपया मात्र था, जिसे 1993 में एक संशोधन के जरिये 1 लाख रुपया किया गया। वहीं 26 साल बीत जाने के बाद भी जमाकर्ताओं के लिए अहितकारी इस नियम में कोई बदलाव नहीं किया गया।
इस बीच कितनी सरकारें आईं और गईं, लेकिन जनधन की गाड़ी कमाई को संरक्षित करने का किसी ने कोई उपाय नहीं किया। खुलेआम डकैती को चालू रखा। जबकि आज की स्थिति में इस बीमा कवर को न्यूनतम 10 लाख या इससे अधिक किये जाने की आवश्यकता हर बचतकर्ता महसूस कर रहा है।
आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2017 तक सार्वजनिक बैंकों का एनपीए 8 लाख करोड़ रुपया हो गया था। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2017 तक मुल्क में पूर्णतया कालातीत ऋणी 9063 हैं। यानी ऐसे ऋणी, जो कर्ज चुकाने की क्षमता रखते हैं, ंिकतु जानबूझ कर ऋण नहीं चुकाते हैं। सरकार ऐसे डिफाल्टरों को राहत प्रदान करती है।
ऐसी नीति करे कोई; भरे कोई की तरह है। अंधेर नगरी चैपट राजा की मानिंद। इधर नीरव मोदी सरीखे लोकधन के लुटेरों धन लूट रहे हैं, उधर आमजन की मेहनत की कमाई से उनकी भरपाई की जा रही है।
खाताधारक पुत्र-पुत्री की पढ़ाई व शादी, घर बनाने; गाय-बैल और टैªक्टर खरीदने; दुकान का एक्सटेंशन करने; सेवा-व्यवसाय बढ़ाने; बुरे दिनों में काम आने; बुढ़ापे का सहारा बनने; बीमारी का इलाज करने; पेट काटकर पाई-पाई इसलिए जोड़ता है कि उसे रईसों व ऐयाशों को देकर डूबत में डाल दिया जाय। वाह रे, बैंकिंग सिस्टम! तेरा जवाब नहीं!! इसलिए तो कहा जा रहा है कि बैंक करे घोटाले; बचतकर्ताओं को मार डाले।
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