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बिहार विधानसभा चुनाव एवं अन्य उपचुनावों के निहितार्थ-वीरेंद्र देवांगना

बिहार विधानसभा चुनाव एवं अन्य उपचुनावों के निहितार्थ::
हालिया संपन्न बिहार विधानसभा चुनाव के 243 सीटों में-से भाजपा 74, जदयू 43, विकासशील इंसान पार्टी 4, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा 4, राजद 75, कांग्रेस 19, वामदल 16, जनशक्ति पार्टी 1, एआईएमआईएम 5, बसपा 1 और निर्दलीय को 1 सीटें प्राप्त हुई हैं।
इसमें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन कुल 125 सीटें प्राप्त कर फिर सत्तासीन हुआ, तो महागठबंधन को 110 सीटें लेकर विपक्ष की राह पकड़ना पड़ा। प्रतिपक्ष बनने पर महागठबंधन के नेता को मतगणना में साजिश नजर आ रहा है, जो उनकी बचकानी भावुकता का परिणाम दिखता है। यदि मतगणना में षड़यंत्र की जाती, तो 110 सीट भी उन्हें नहीं मिल पाती।
बिहार विधानसभा चुनाव 2020 भाजपा के लिए सबसे अधिक फायदेमंद साबित हुआ। उसका स्ट्राइक रेट जहां विगत चुनाव 2015 में 33 प्रतिशत था, वहीं 2020 के चुनाव में बढ़कर दुगुना अर्थात 66 प्रतिशत हो गया।
वहीं कांग्रेस का स्ट्राइक रेट जो 2015 के चुनाव में 66 प्रतिशत था, 2020 के चुनाव में घटकर 29 प्रतिशत रह गया और वह राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद बिहार में सीटों के लिहाज से चैथी पार्टी बन गई।
जदयू का भी विगत चुनाव 2015 में स्ट्राइक रेट जहां 70 प्रतिशत था, वहीं चुनाव 2020 में घटकर 36 प्रतिशत रह गया। किंतु जदयू के लिए सबसे अच्छी बात यह हुई कि उनके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही राजग ने मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान चुनाव में किया हुआ था। इसलिए, नीतीश कुमार की ही मुख्यमंत्री के रूप में पुनः ताजपोशी होनेवाली है।
इस तरह वे सातवीं बार मुख्यमंत्री बनने की राह पर हैं। वस्तुतः, यह उनकी सोशल इंजीनियरिंग व सुशासन तथा नरेंद्र मोदी का देशव्यापी प्रभाव ही थी, जो भाजपा संग राजग को जीत के करीब ले गई।
बिहार चुनाव के परिणामों पर प्रधानमंत्री ने कहा है कि बिहार तो सबसे खास है। बिहार के चुनावी नतीजों के बारे में पूछेंगे, तो चुनाव जीतने का एक ही राज है-सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास। बिहार में सच जीता है, विश्वास जीता है, युवा जीता है, गरीब जीता है, यह बिहार की आकांक्षाओं की जीत है, बिहार के गौरव की जीत है।
उन्होंने यह भी कहा कि कल से सुन रहा हूं कि साइलेंट वोटर ने राजग को जिताया। वे साइलेंट वोटर महिलाएं हैं। ये साइलेंट वोटर बार-बार भाजपा को वोट दे रहे हैं। भाजपा चारों तरफ जीती है। पूर्वोत्तर में मणिपुर, पश्चिम में गुजरात, दक्षिण में कर्नाटक और तेलंगाना, तो उत्तर में उप्र और मध्य में मप्र। जबकि दूसरी ओर कश्मीर से कन्याकुमारी तक परिवारवादी पार्टिंयों का जाल नजर आ रहा है, जो लोकतंत्र के लिए किसी खतरे से कम नहीं हैं।
इस चुनाव का निहितार्थ यही है कि भाजपा जहां राष्ट्रीय पार्टी के रूप में महाराष्ट्र व झारखंड की हार की भरपाई कर ली है, वहीं राष्ट्र का अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबल नेतृत्व से मोहभंग नहीं हुआ है। इसका फायदा भाजपा को प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में मिल सकता है।
दूसरी ओर कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों को अपना प्रदर्शन बेहतर करने हेतु नकारात्मक राजनीति और परिवारवादी मानसिकता को जितनी जल्दी हो त्यागने की जरूरत है। लेकिन, अफसोस कि कांग्रेस सुधरने के लिए तैयार नहीं है। उसके कुछेक स्वयंभू नेता कांग्रेस के पिछड़ने का कारण अभी तक ईवीएम को बता रहे हैं। यह अजीब सोच है कि जहां वे जीत जाते हैं, वहां ईवीएम ठीकठाक रहता है और जहां हार जाते हैं, वहां खामी दिखता है।
इन चुनावों में सबसे बड़ा नुकसान चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को हुआ, तो दूसरा सबसे बड़ा लाभ ओवैसी की पार्टी को हुआ। चिराग पासवान की पार्टी जहां एक सीट हासिल की, वहीं ओवैसी की पार्टी 5 सीटें जीत गई। इससे ओवैसी महाशय को तेलंगाना राज्य से बाहर पैर फैलाने का अवसर मिल गया।
यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि बिहार विधानसभा चुनाव में लोकजनशक्ति पार्टी को 23.8 लाख लोगों ने वोट दिया, परंतु उनका केवल एक प्रत्याशी जीता, वहीं एआइएमआइएम को 5.2 लाख वोटरों ने वोट दिया और उसके 5 प्रत्याशी विजयी रहे।
मात्र 1.23 फीसदी वोट लेकर ओवैसी महाशय 5 सीटें जीते हैं, तो 5.64 फीसदी मत पाकर भी चिराग पासवान के एक छोड़कर सभी चिराग बुझ गए।
एआइएमआइएम उन सीटों पर चुनाव जीता है, जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 70 प्रतिशत से अधिक हैं। इसका आशय यह भी कि मुस्लिम वोटरों ने केवल और केवल एआइएमआइएम को वोट किया। उन्होंने मुस्लिमपरस्त आरजेडी तक को नकार कर उनके मुंह में तमाचा जड़ दिया है।
इससे भविष्य में उन सीटों पर पैर पसारने का मौका मिल सकता है, जहां की जनसंख्या में मुस्लिम वोटर सर्वाधिक हैं। यही कारण है कि ओवैसी की पार्टी जहां नागरिकता कानून का विरोध करती रहती है, वहीं घुसपैठियों का समर्थक बनती रहती है, ताकि उसके वोटबैंक में इजाफा होता रहे।
इस चुनाव का निहितार्थ यह भी अब ओवैशी की पार्टी के राष्ट्रव्यापी चुनाव मैदान में उतरते ही जहां कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति का अंत होनेवाला है, वहीं तृणमूल कांग्रेस, राजद, सपा, बसपा, राकांपा, नेका, पीडीपी जैसी पाटियांे के अस्तित्व को भी चुनौतियां मिलनेवाली हैं।
इसका कारण यह कि ये पाटियां अल्पसंख्यकों को लुभाने का काम किया करती थीं और वोट अपने खाते में कबाड़ती थीं, लेकिन अब इसमें पूर्णविराम लगने की संभावना है।
इसी के साथ राजग सरकार के सामने केंद्र और राज्य की योजनाओं को जमीनी स्तर पर पहुंचाने, शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर काम करने की जरूरत आन पड़ी है। साथ ही सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने की भी आवश्यकता है।
इसी तरह अपराध की रोकथाम के लिए पुलिस-प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त एवं भ्रष्टाचारमुक्त करने की चुनौती मुंह बायंे खड़ी है। युवाओं को रोजगार देना भी अहम मुद्दा है। यदि सरकारी कार्यालयों में रिक्त पदों पर पदपूर्ति ही कर ली जाती है, तो बेरोजगारों का खासा वर्ग उसमें रोजगार पा सकता है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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