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फर्जी आदिवासी-वीरेंद्र देवांगना

फर्जी आदिवासी::
छग के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत प्रमोद कुमार जोगी की मृत्यु से रिक्त मरवाही विधानसभा, (जो अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है) उपचुनाव के लिए नामांकनपत्र दाखिल करने के दौरान जिला निर्वाचन अधिकारी, ने जकांछ के वर्तमान अध्यक्ष अमित जोगी की पत्नी श्रीमती ऋचा जोगी का नामांकन खारिज कर दिया।
कारण कि राजधानी रायपुर में उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति ने अमित जोगी के कंवर-अनुसूचित जनजाति के प्रमाणपत्र को रद्द करने के फैसले पर समिति के सभी पांचों सदस्यों ने अपनी मुहर लगा दी थी।
राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने अपने फैसले में लिखा है कि अमित जोगी स्वर्गीय अजीत जोगी के पुत्र हैं। छानबीन समिति द्वारा 23 अगस्त 2019 के अपने आदेश के जरिये स्वर्गीय अजीत प्रमोद कुमार जोगी के कंवर अनुसूचित जनजाति संबंधी जाति प्रमाणपत्र को निरस्त किया गया है। पुत्र की जाति, पिता की जाति से अभिनिर्धारित होती है।
ऐसी स्थिति में छानबीन समिति के समक्ष अमित जोगी के पक्ष में जारी कंवर अनुसूचित जनजाति के जाति प्रमाणपत्र को निरस्त किए जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
समिति ने अपने आदेश में लिखा है कि अनुसूचित जाति जनजाति और अन्य पिछड़ावर्ग अधिनियम 2013 की धारा 8(1) एवं नियम 2013 के नियम 23(2) में विहित प्रावधानों के अनुसार अनुविभागीय अधिकारी पेंड्रारोड जिला बिलासपुर द्वारा 31 अक्टूबर 2013 को अमित जोगी के पक्ष में जारी कंवर अनुसूचित जनजाति के जाति प्रमाणपत्र को निरस्त किया जाता है।
इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत मंत्री अमरजीत भगत, प्रेमसाय सिंह टेकाम, कवासी लखमा, महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष फूलोदेवी नेताम, सांसद दीपक बैज, विधायक लखेश्वर बघेल, चंदन कश्यप, शिशुपाल सोनी, नंनकीराम कंवर आदि ने किया है।
उनका कहना है कि नकली आदिवासी नौकरी से लेकर राजनीति तक नाजायज रूप से फायदा उठा रहे हैं, इसपर रोक लगनी चाहिए। वे इसकी मांग विश्व आदिवासी दिवस तथा आदिवासी समाज के सम्मेलनों और कार्यक्रमों में उठाते रहे हैं।
यह फैसला उस सड़ी-गली व्यवस्था पर करारा तमाचा है, जिसका फायदा उठाकर एक नकली आदिवासी मैनिट, भोपाल में दाखिला ले लेता है, फिर यूपीएससी में सलेक्ट होकर एसपी और कलेक्टर बन जाता है और बरसों तक बना रहता है, फिर राज्यसभा और लोकसभा में चला जाता है और अंततः एक नवप्रदेश का मुख्यमंत्री बन जाता है। फिर आरक्षण का लाभ उठाकर कई मर्तबा विधायक बन जाता है और अंत में परलोक सिधार जाता है।
क्या सरकार इस फर्जी आदिवासी परिवार की उन तमाम संपत्तियों को राजसात करेगी, जो उन्होंने फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी पाया है और लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचकर प्रदेश का मुखिया बनकर जनमानस और सरकार को घोखा दिया है।
फिर उन अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए, जिसने उसे प्रारंभ में अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र दिया था, जो फर्जी साबित हुआ है।
ऐसी और इसी तरह की अन्य दुव्र्यवस्थाओं से भारतीय जनमानस रुष्ट रहता है और गाहे-बगाहे हिंसक हो उठता है। व्यवस्था के प्रति जनमन की नाराजगी का यह एक बहुत बड़ा कारण है।
लोगों को जब लगता है कि यहां व्यवस्था और न्याय की उम्मीद करना बेमानी है, तब वह बागी, नक्सली, अतिवादी और अपराधी बन बैठता है। माब लिंचिंग करने लगता है, कानून को अपने हाथ में ले लेता है।
यही नहीं, एक अकेले छग राज्य में अब तक 580 फर्जी आदिवासी होने की शिकायतें मिली हैं, जो सरकारी नौकरियों में काबिज हैं। इनमें भी 245 मामले स्पष्ट तौर पर फर्जी पाए जा चुके हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ है। वे सेटिंग कर नौकरियों में काबिज हैं। 115 की जांच जारी है तथा 220 की शिकायतें निराधार मिली हैं। फर्जी प्रमाणपत्रों के मामले 17 सालों से लंबित हैं।
कई हाईकोर्ट से स्टे लेकर मजे से नौकरी कर रहे हैं। इनमें कई आइएएस और राज्य सेवा के अधिकारी-कर्मचारी भी हैं। सवाल यह भी कि जो अजाक्स बात-बात पर धरना-प्रदर्शन करता रहता है, वह इस गंभीर मामले में मौन क्यों है?
यह तो एक-अकेले मझौले राज्य की स्थिति है। इसको छोड़कर देश में ऐसे छोटे-बड़े 28 राज्य और 7 केंद्रशासित प्रदेश हैं। उनके सही आंकड़ों का अता-पता नहीं हैं कि कहां कितने लोग नकली आदिवासी बनकर असली आदिवासियों का हक मार रहे हैं।
एक अनुमान के मुताबिक यह संख्या 25 हजार के आसपास है, जिन्हें हर माह करोड़ों रुपया वेतन$भत्ता$सुख-सुविधाओं के रूप में भुगतान किया जा रहा है। क्या यह जातिगत आरक्षण का दुरूपयोग नहीं है?
क्या सरकारों को नहीं चाहिए कि उनकी पहचान मुकम्मल की जाए और उनको सेवा या नौकरी से बर्खास्त किया जाए। जिस दुव्र्यवस्था में एक नकली आदिवासी परिवार बरसों से आदिवासियों के हितों पर कुठाराधात कर रहा हो और सरकारें न केवल देख-समझ रही हैं, अपितु उनका महिमामंडन भी करती रही हैं।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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