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मोती लाल साहु
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मोती लाल साहु
मोती लाल साहु
मोती लाल साहु
@ --7
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चंचल मन उप वन में ठहरी....
चंचल मन चित वन में कर्म, क्लेश कट गए उम्र तमाम। तब ठहरी उप वन में पिया, संग सुध बुध खो सो रही।। -मोती
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अमृतधारा हर कुंभ में
मन की- तृष्णा तड़पती प्यासी, भटकती सारे जहां में हर कुंभ में- छलकता अमृत की धारा बेगाना- खोजता संसार कूप में -मोती
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प्रेम हृदय की उपासना
प्रेम हृदय की- उपासना है जिसका संबंध, निज स्वरूप या ईश्वर से है प्रेम की- इस धारा में, जो डूबा सो पार संसार का प्रेम-प्रेम- की प्रतिछा
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चलते चलते
चलते-चलते- गुज़र गए कितने ही युग इस जहां को ये- अनवरत संपन्न हो रही है यह प्रकृति- अपने कार्य में मुस्तैद सटीक- बिल्कुल ठिकाने से, �
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आ चलेंगे जहां प्रेम पले....
आ चलेंगे जहां- धरती अंबर का प्रेम पले शाम ढले सूरज की लाली, पड़ते सरोवर में तैरते हंस नीड़ को- लौटते पंछी का कलरव जब नीले अंबर में ये
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गा रहा हूं तेरा ही ये तराना....
गा रहा हूं तेरा ही ये तराना, कहां है तू ओ जाने जाना ढूंढे ये दिल मेरा- आजा तू मीत मेरा तेरे बिना- जीना नहीं है गवारा, कहां है तू वो जान�
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कभी चलते नहीं देखा....
कभी चलते नहीं देखा! सांसों की- हवा में मिट्टी, को रोते हंसते देखा चार कंधों- के बोझा को, मिट्टी में मिलते देखा इस- कायनात को, अनवरत च�
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दीदार ए-नूर....
मैं हूं तेरे दर का दीवाना! मैं पथिक- जीवन में गाफिल हुआ, मुक़ाम तक आते-आते मैं हूं तेरे दर का दीवाना! दीदार ए-नूर- का जलवा दिखा दे, प्य�
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हमसफर की तलाश....
पर्दे में वो सपनों की कली खिली बैठी है। इंतज़ार में अब एक नज़र को है बेकरार।। हमसफ़र की ये तलाश तेरा ही हर करम। इनायत है अब खुदा की तुम
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ये दिलनशीं....
कभी खयालों में आते हैं- तो गुज़र लेते हैं हम आपके, शहर में कभी-कभी ये-दिलनशीं खनकती, हंसी आपका ये-चेहरा दिलबाग कर जाते हैं- तो आते हैं
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