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मोती लाल साहु
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मोती लाल साहु
मोती लाल साहु
मोती लाल साहु
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"तारणहार"
कण-कण में बसता, जग में व्यापक वो। रहता सबके अंदर, वहीं नीयता तारणहार।। मोती-
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"प्रकृति मनोरम"
अद्भुत प्रकृति मनोरम, गुलशनें हैं बहार। चहकता महकता चमन, इश्क है बेपनाह।। मोती-
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"संत कौन"
अपने अंतःकरण स्थित, सत्य को तत्व रूप से। जाना हुआ व्यक्ति, ही संत है।। मोती-
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"राग दीपक"
अलंकृत कर रिद्धि-सिद्धि, चहकें राग रागिन। जगीं निशा हर सिंगार, दरबार मनभावन।। मांँ सरस्वती की-कृपा, समाई ह्रदय-कमल। प्रस्फुटित कंठ
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"कलियुग में रिश्ते"
ये नज़दीकियां सब खास से। टटोला है रिश्ते खास को।। मतलबे इश्क करते हैं सब। पान के सम खाते होठ लाल।। पीक फेकते खून सा लाल। घोर कलियुग क�
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"अनुभव"
अद्भुत सब प्रकृति सुंदर, दीदार करता दिल। चहकता-महकता-चमन, गुलशने बहार तुम।। मोती-
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"अंत में ही अनंत"
कृपा अनंत का यह तन, में अंत वा अनंत। चंद श्वासों का यह जीवन, श्वास में हीं अनंत। मोती-
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"हुजूर का दरगाह"
ढूंढता प्यासा निगाह, अनजान वह सूरत। सुरति जगी दिल अंदर, दरगाह में हुजूर।। मोती-
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"ईश प्रेम"
हिय प्रवाहित ईश प्रेम, उर में प्रगाढ़ भक्ति। जन्म-जन्मांतर का तप, तपे साईं परगट।। मोती-
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"स्वांस के झूले में-हंस"
मन के हैं चार तरंग, बुद्धि-चित-अहंकार। बस में नहीं मन चंचल, बुद्धि का नहीं मोल! अहंकार तो सरताज, गया चेत सब शुन्य। चेतना हुआ चैतन्य, जब
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