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ग़ज़ल
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ग़ज़ल
जिंदगी को जीने के बहाने मिले हैं
जिंदगी को भी कोई वजह मिल गई है न जाने वक़्त ने यह कैसे जीने के बहाने दिए हैं कभी जिनके गलियों से गुजरने के बहाने ढूंढते थे वही आज म�
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मां
रिश्तों का क्या , उस फरिश्ते से रिश्ता हैं ना खोज ले तू सारे जमाने में , मां से बड़ा कोई फरिश्ता है क्या ! बिना मतलब के रिश्ता निभाएं ब�
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क़भी वापस ना आऊँगा मैं
चाहता हूँ कही दुर चला जाऊँ मैं जहां कोई ना अपना हो बस अपना एक प्यारा सामठ होगा जहां मै और उसकी यादों रहेंगी उसकी तस्वीरों को दीवारों
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गजल--नजर से नजर मिला नहीं सकते
ग़ज़ल नजर से नजर मिला नहीं सकते, जब खुद की नजरों से गिर गए। झूठी शान शौकत की जादूगरी से, बजूद अपना ही मिटाते चले गए। डगमगाए
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इश्क का नजराना
इश्क का नज़राना कवि से नही कविता से प्यार कीजिए । मैने तो कर दिया आप भी इंतजार खत्म कर , इश्क ए इज़हार कीजिए ।। रचनाकार पर नही रचना पर �
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पिता
पिता शीर्षक-पिता जीवन भर बोझा ढोता है। अक्सर सुख से कब सोता है।। सीने में दफनाता हर गम। कभी न खुलकर वह रोता है।। हर विपदा के आगे वह
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इस कदर ना तुम रूठा करो
इस कदर ना तुम रूठा करो ये हंसी चाँद सी ये पलके गुलाब सी ये बदन पे चोटी साप सी. फिर भी इतनी खास हो तुम. रात की नींद हो तुम दिन की छाँव हो त�
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इस कदर न बहा आशुओं को
इस कदर न बहा आशुओं को बेजुबान से इन कणो को कोई ना कोई होगा जानने वाला कोई ना कोई होगा समझ ने वाला.
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नुसरत _ ए _ मौहब्बत
नुसरत_ ए_ _मौहब्बत सबका साथ बांटने चला हूं। तकल्लुफ करके देखना जरा पहरों को आठ बांटने चला हूं। खुशामद तो मैंने बहुत की थी चांद _सूरज की
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लहजा
ये नरम लहजा प्यारी बाते तेरे लिए है हम इस लहजे में सबसे बात नही करते
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कौन समझाए ये इश्क को
तू आगे बढ़ क्यों गई पीछे मूड कर देख ली होती बेचारे इश्क़ को, बोल दिया होता पर डर था तुम्हारे मुस्कुराहट से की ओ ना चला जाए,, तेरी मुस्कान
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प्यार की अमानत
दिल ने लिखी एक इबादत है ताजमहल प्यार की अमानत है हृदय खिल उठा फूल .सा आपसे मिलकर आप आए बड़ी इनायत है फूलों का हार मेरे हाथ में तो नह�
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