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कविताएँ
इस कदर सजाया था
मेरी खूबसूरती को उसने इस कदर सजाया था बिंदी लगाना भूल गई थी उस दिन तो उसने काले पेन से टीका लगाया था 2 वो अक्सर दूर से ही देखता था मु�
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रोजी रोटी के लिए
रोजी रोटी के लिए, परेशान हैं लोग। कुछ जन को तो बहुत है,कुछ को कुछ मत भोग।। रोजी रोटी के लिए, करना पड़ता काम। करा मेहनत से मिले,सुन्दर प�
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प्यार जिन्दगी साज है
प्यार जिन्दगी साज है,इससे ही संसार। दिल में रख इसको सदा,सबको करें दुलार।। सभी काम सुलझे सही, रखें अगर हम प्यार। बाधा सारे खत्म हों, जी�
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विधा विनय विवेक
विद्या विनय विवेक को,सदा करें सम्मान। मिले आशीष खूब तब, बढ़े नित्य ही ज्ञान।। विद्या विनय विवेक से, जीवन में हों हर्ष। यह पूंजी अनमोल
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मेरा पहला प्यार
मेरा पहला प्यार है, मां का ही कर ध्यान। मां से ही दुनिया चले, मां ही हैं सब ज्ञान।। मेरा पहला प्यार है, मां से ही है हर्ष। मां ममता की रू�
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नफरत बढ़ती जा रही
नफरत बढ़ती जा रही,क्योंकि सभी में लोभ। सब अपना ही देखते,औरों से कर क्षोभ।। नफरत बढ़ती जा रही, खुद में है जो मस्त। अपनों को पूछे नहीं,सम
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आहट कोई आने को है
बादलों की गड़गड़ाहट देती है यह आहट आहट कोई आने को है एक आहट की कोई आने को है मोती बरसाने को है मिट्टी में घुल जाने को है फूलों को भींगान�
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सब एक जैसा हो जाए
मां की दुआओं जैसा बसंती हवाओं जैसा सागर की ठंडी लहरों जैसा सूरज की किरणों जैसा बारिश की बूंदों जैसा ले आओ सब कुछ जो कुछ हुआ ऐसा सिमट जाए
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जज्बातों में उलझी ज़िंदगी की कहानी
जज्बातों में उलझी जिंदगी की कहानी कभी हंसती तो कभी रोती जिंदगानी कर अपनी मुस्कुराहट पर भरोसा हंसती हुई लगे रोती जिंदगानी जज्बातों
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कौन थामें गा
ऐ जंगल सी लड़की दिल में बबंडर क्यों जगती खुद सांत रह के दिल में हलचल क्यों मचातीं हैं ! क्यों क्यों क्यों बेचैन करती हैं रूह मेरी बे �
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एक दिन की फुरसत चाहिए
मुझे भी अवकाश चाहिए जितना काटना हैं काट लो आपस में सब बाट लो बस एक दिन विश्राम चाहिए ! मैं थक गया हु सब के बोझ उठा के दव गया हु पेड़ पौध
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एक निगाह आशा से भरी....
एक निगाह आशा से भरी! मुद्दत हो गए- निहारता हूं गांव, के चौबारों को जहां खेलते बचपन गुजारे थे हमने वादा- किया था साथ, निभाने का जीने म�
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