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कविताएँ
ज़ख्म का शोर..
**"ज़ख्म का शोर"** ये शहर के कोने, ये गलियों का अंधेरा, जहाँ इंसानियत रोज़ मरती है, बिखरता है बसेरा, बलात्कार की खबर, हत्या की दास्तान, र�
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नक्षत्रा
कधी चंद्राकडे पाहतो, कधी पाहतो तिला ती म्हणे काय मिळणार लीहिण्या करिता माझ्यात तुला . फारसे काही नाही तुझे केस छान आहे , कित्तेकांचे
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कलयुग के रंग
लगेगी कलयुग की फटकार, मचेगा जग में हाहाकार गाय, खूंटा तुड़वाकर भागेगी, निज पति संग रास नहीं, नारी पर पुरुष से नैन लड़ाएगी। औरों की �
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🇮🇳 उम्मिदों कि रौशनी... ✍️
ऊदय प्रत्ता: अधिन्स्त्त किरण ! और अस्त्त - व्यस्त्त मज़धारों में!! है! चम़क रही उम्मिदों कि रौशनी, हर नयें - नयें अवत्तारों मे!!
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सोबती मिळत नाही समीर लांडे
रात्रीच्या पावसात गवताची वाट, कुजलेली काही , काही घनदाट. आणि एकटाच प्रवासात, आणि फक्त प्रवास. एक सोवळे व्यक्ती, म्हणे स्वतः साठी लढ�
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मंक्षिका
एक मक्षिका नेहमीच तिच्या चेहऱ्या भवती तिला त्रास देते , आणि रोगाची साथ माझ्या हृदयात पसरते. बरोबर फुलांवर बसलेल्या भौऱ्या प्रमाणे ,
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बढ़ना है तो झुकना सीखो
बढ़ना है तो झुकना सीखो लोगों से नहीं रे बुद्धू परिस्थितियों से लड़ना सीखो सुनना सीखो सुनना सीखो हर पाड़ हराना है तुझको तू पीठ में इत�
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मनगट
काळ पहिल्याचाच छान होता जेव्हा उंबरठा मुलींसाठी भिंती समान होता , तो काळ देखील महान होता . बाहेर निघूनही केलच काय ? बळी गेल्या आणि उग
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आंकड़ा
शहर में विस्फोट के, सुनो समाचार। अलग-अलग जगह बम फटे, बम फटे दो-चार चालीस के चिथड़े उड़े, मृतक सौ के पार। साठ इलाज दौरान मरे, आंकड़े ज�
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अनमोल दोहे
सुख दुख तेरे हाथ हैं, जग के सिरजनहार। आप चला जैसा रहे, चलता है संसार।। सुख दुख तेरे हाथ हैं, जग के तारणहार। मेरी ग़लती माफ़ कर, करिए �
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संस्कृति में बदलाव
*कविता* * संस्कृति में बदलाव * पिता ,पापा और डेड से हो गये हैं अब पाप्स मां ,माता और मम्मी से हो गई हैं अब मोम। पश्चिमी शब्दों के चलन
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प्रेमी की अभिलाषा
उसके जूड़े का बनूं, यदि मैं बन फूल सकूं। रेशमी जुल्फ़ों की महक से, अपनी महक भूल सकूं। आंसू बनूं उसकी आंखों का, नीली आंखों में घर कर सक
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