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बाल दिवस के लिए विशेषः बच्चों में अच्छी आदतों का विकास-वीरेंद्र देवांगना

बाल दिवस के लिए विशेषः
बच्चों में अच्छी आदतों का विकास
इंदौर में संजीवनी बालमित्र केंद्र है। यह केंद्र चिल्ड्रन बैंक स्थापित कर बच्चों में बचत की आदत विकसित कर रही है। बीते कई सालों से 14 साल तक के 150 बच्चे इस बैंक में अपना पाकेट मनी जमा कर रहे हैं। बैंक में यह सुविधा है कि बच्चा चाहे तो उसे कापी-किताब खरीदने, खेलकूद के उपकरण लेने, जन्मदिन मनाने या अन्य जरूरतों के लिए उधारी दिया जा सकता है। यह प्रयोग उन्हें बैंकिंग प्रबंधन की दीक्षा और बचत की शिक्षा दे रहा है।
प्रयोग सुखद, सराहनीय व संस्कारी है। इससे बच्चा बेहतर भविष्य की ओर पहला कदम बढ़ा सकता है। कहा भी गया है, ‘‘जो बचा लिया, समझो कमा लिया’’ जिस तरह बूंद-बूूंद से घड़ा भरता है, उसी तरह एक-एक पैसा जोड़कर हजारों-लाखों रुपया जमा किया जा सकता है।
बचाया हुआ धन न केवल सुकून देता है, अपितु आड़े वक्त में काम भी आता है। बचत करनेवालों को कभी किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत नहीं आती। वह हाथ खींचकर खर्च करता है और जरूरत के मुताबिक खर्च करता है, इसलिए सदा सुखी रहता है।
पंडित मदन मोहन मालवीय ने बनारस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। उन्होंने लोगों से एक-एक रुपया सहयोग लेकर विवि जैसी वृहद संरचना का निर्माण कर लिया था। इतिहास में ऐसे उदाहरण ढेरों हैं, जिनसे संचय की प्रवृति सीखी जा सकती हैै। इंदौर के इस मिसाल को अन्य शहरों में भी संजीदगी से लागू किया जाना चाहिए।
दूर क्यों जाएं। बच्चों के दादा-दादी व नाना-नानी की पीढ़ी को गुल्लक के जरिए बचत की आदत सिखाई जाती थी, जो बाद में उनके लिए संस्कार बन गई। उन्होंने यह संस्कार अपने माता-पिता व दादा-दादी से सीखा, जो अपने गुल्लक में प्रतिदिन का बचा हुआ चिल्लर डालते थे, जो सालभर में खुलने या फोड़ने से सैकड़ोंझारों रुपए की बचत सामने दिख पड़ती थी। वे बेजा खर्च कभी नहीं करते हैं और बचाया हुआ पैसा उचित जगह ही लगाते हैं। इसलिए उनके पास धन की कमी नहीं रहती।
बैंक, पोस्ट आफीस व स्वसहायता समूह अधिकाधिक खोलने का भी यही कारण है कि लोग इससे जुड़ें और अपनी गाड़ी कमाई को आढ़े वक्त के लिए इसमें संचित करें। इससे जहां ब्याज की प्राप्ति होती है, वहीं धन सुरक्षित रहता है।
स्वसहायता समूह की अवधारणा भी इसी बचत प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है और आढ़े वक्त के लिए धन मुहैया करवाता है। स्वसहायता समूह तो उन गरीब महिलाओं व पुरुषों के लिए वरदान बन गया है, जो एक साथ बड़ी रकम जमा नहीं कर सकते। उन्होंने बूंद-बूंद से घड़ा भरने की उक्ति को चरितार्थ कर दिखाया है। यही बात महान विचारक खलील जिब्रान भी कहते हैं।
खलील जिब्रान ने कहा है, ‘‘जो व्यक्ति सोचता है कि समय का एक क्षण कितना है, वह कभी सफल नहीं हो सकता। दरअसल, सफल वही होता है, जो समय के एक-एक क्षण का मोल जानता है। इसी तरह, जो व्यक्ति मानकर चलता है कि एक पैसा होता ही कितना है, उसको दरिद्र होने से कोई नहीं बचा सकता। एक-एक पैसे के दुरूपयोग की आदत राजा को रंक बना देती है, तो सदुपयोग की आदत रंक को राजा।’’
इसी तरह बच्चों को काम-कमाई की बातें भी सिखाई जानी चाहिए। उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि घर का खर्च कैसे चलता है? आय कहां से और कैसे होती हैं? उसमें से कितना खर्च किया जाता है और कितना बचाया जाता है। यदि बचत नहीं होती, तो क्यों नहीं होती?
हो सके, तो उन्हें माह का खर्च चलाने की दीक्षा दी जानी चाहिए। यह इसलिए कि यदि आप और हम यह शिक्षा नहीं देंगे, तो इसकी शिक्षा कौन देगा? स्कूलों-कालेजों में तो यह पढ़ाया नहीं जाता कि घर के खर्च कैसे चला करते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि उन्हें आय और व्यय की जानकारी देते रहना चाहिए।
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