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आतंक-अजय-प्रताप सिंह–

जिस ओर उठाकर मुख देखा,
हुआ उधर आज झगड़ा सा है।

आ देख चमन के वाशिंदे,
क्यो चमन आज उजडा सा है ॥
होली खून की खेल रहे,
गद्दार बैठ कर लाशों पर |
आज नियंत्रण नहीं रहा,
मानव का अपनी सांसो पर’ ॥
नेता बैठे हैं पाशों पर ,
उद्दंड आज निखरा सा है ।
आ देख चमन के वाशिंदे … उजड़ा सा है ॥
सत्य निष्ठा दबी हुई है,
आज यहां इल्जामों से ।
कर्तव्य निष्ठ को दाब दिया है,
कुर्ता और पैजामों से ॥
कर्म दबा है जामो से,
और धर्म आज मदिरा है ।
आ देख … उजड़ा सा है ॥
आवाज नहीं है आज यहां’
जो न्याय और निष्ठा मांगे ।
चहुॅ ओर विरासत हैवां की ‘
भागे तो कोई कहां भागे ॥
जब तक जन-जन ना जागे,
यह वतन फटे अँचरा सा है ।
आ देख ….. उजड़ा सा है ॥
मेलजोल से लूट रहा,
भाई को भाई आज यहां ।
बंदूक और तलवारों के ,
सुनने पडते हैं साज यहाँ ॥
बंद हुई आवाज यहां ,
हुआ ‘अजय ‘आज कविरा सा है ।
आ देख ………….. उजड़ा सा है ॥
सोने की चिड़िया को हमने,
मिट्टी का ढेर बना डाला |
कल तक जो गीदड़ थे,
उनको हमने शेर बना डाला ‘ ॥
विश्वास को खेल बना डाला ,
यूँ वतन आज उजड़ा सा है ।
आ देख ….. . .. उजड़ा सा है ॥
आज माँत का आंचल ,
धूमिल है तुच्छ विचारों से ।
मां की आंखों में भड़क रहे हैं,
मनोभाव अंगारों से ॥#
क्योंकि मां के प्यारों से ,
हुआ मां को ही खतरा सा है ।
आ देख ….. उजड़ा सा है ॥

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