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कल्पना-अजय-प्रताप सिंह

आत्म विभोर सा हो ,मैं बस यूं ही देखता रहा ॥
वोआई मेरे ख्वाबों में ,और आकर चली गई ॥

दिल धड़क रहा था ,सांसे तेज थीं,
आहट सी हुई ,दिल के किसी कोने में ,
वोआहट ही ,मेरे दिल को, सता कर चली गई ॥
वो आई मेरे ख्वाबों में ,और आकर चली गई ॥
शायद यही दर्द ,मेरे दिल को, भेदता रहा ॥
आत्म विभोर सा हो ,मैं बस यूं ही ,देखता रहा ॥

लगता था वह मेरे करीब थी ,उसकी गंध थी मेरी सांसों में,
मैं खड़ा था बगीचे में ,शायद कुछ फूल महक रहे थे,
गंध थी उन्हीं की ,बहका कर चली गई ॥
वोआई मेरे ख्वाबों में ,और आकर चली गई ॥
शायद उसी गंध से ,दिल बहकता रहा ॥
आत्म विभोर सा हो ,में बस यूँ ही देखता रहा ॥

दिन ढल चुका था, एहसास ना हुआ ,
बस यूं ही खड़ा रहा, उस तरु के समीप ,
ओस की एक बूंद , जगा कर चली गई ॥
वोआई मेरे ख्वाबों में , और आकर चली गई ॥
ओस कोअश्क समझ , फेंकता रहा ॥
आत्म विभोर सा हो ,मैं बस यूं ही देखता रहा ॥
वोआई मेरे ख्वाबों में ,और आकर चली गई ॥

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