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प्रजातंत्र का खेल-अजय-प्रताप सिंह

जनता ही प्रतिनिधि चुनती है ,
नए-नए सपने बुनती है ।
प्रतिनिधि ही सरकार बनाते,
सरकार भला कब ,जनता की सुनती है ॥
प्रतिनिधि भी कब बोले हैं,
जनता की वाणी मीटिंग में ।
सरकारी फोन यूज करते ,
जन आवाजें वेटिंग में ॥
प्रतिनिधि अपनी जेबें भरते हैं ,
कब मुद्दों पर मीटिंग करते हैं ।
सरकारी मनमानी करती ,
प्रतिनिधि जनता से चैटिंग करते हैं ॥
सत्ता में आने की खातिर ,
नए-नए प्रलोभन लाते ।
जाति -जाति को ,धर्म -धर्म को ,
एक दूसरे से लड़वाते ।
बोकर नफरत का अंकुर ,
.अपना कमल खिलाते हैं ।
दिखलाइ तब ही देते हैं ,
जब आम इलेक्शन आते हैं ॥
नोट बांटते, मदिरा देते ,
जगह -जगह रैली आयोजन ।
जय भारत की .,जय किसान की,
हरिजन के संग करते भोजन ॥
नई शैली ,नईधुन ,
हर जगह सुनाई देती है ।
कहीं मंदिर की ,कहीं मस्जिद की ,
झलक दिखाई देती है ॥
बांस झुंड रूपी जनता में,
एक चिंगारी पड़ती है ।
मरे तो काठी ,बचे तो सीढी,
पक गए तो लाठी बनती है ।
पके बांस की यह जन लाठी ,
फिर जनता को धुनती है ॥
सरकार भला कब
जनता की सुनती है ॥
जनता ही प्रतिनिधि चुनती है ॥
नये-नये सपने बुनती है ॥

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