Notification

समाज एक ‘झूठ’ या ‘सच’ -अजय-प्रताप सिंह

मनुष्य एक सामजिक प्राणी है
वहीं वाजिब ,वहीं नावाजिब ।
पर कैसा सामाजिक ,वाजिब या नाबाजिब ॥
यहाँ सरे राह ‘ दो मनुष्य एक का सर ले जाते है,
दुराचारी एक बेवस का , अबला का
शरीर , आत्मा सब हर ले जाते है
जहाँ एक कमजोर ,बेबस को लाचार कर,
मजबूर किया जाता है , चलने को उस राह पर,
हेय दृष्टि से देखी जाती है ,
जो समाज मे ,
जिसकी मंजिल रही दलदल ,
कल और आज में ,
जिस राह को किसी ने भूख के लिये चुना ,
किसी ने प्यास मिटाने को ‘
किसी ने मजबूरी के लिये चुना
तो किसी ने लुफ्त उठाने को ‘ I
क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक …….. ॥

कमजोर का साथ कोई नहीं देता ,
बेसहारा को हाथ कोई नहीं देता ‘
बेबस को आस कोई नही देता,
मरते को स्वास कोई नहीं देता,
तड़फता छोड़ देते है ,
यूॅहि मर जाने को ।
क्योंकि मनुष्य ……………….. ॥

जो काम कुछ नही करता उसे सब देते है ,
भिखारी जिसे कहते है ,
हट्टा कट्टा भी ‘ बिना लचारी भी
मंगाता है जो कभी मंदिर के द्वार पर ,
कभी स्टेशन पर ,कभी सडक पर ‘,
इक्ट्ठी भीख से ,कभी द्वार पर,
पीता है शराब ,
होकर मय (नशा) में चूर ,
मांगा है जहाँ से ,उन्हीं को घूर -घूर ‘
देता है गालियाँ , कहता है बेवकूफ ।
क्योंकि मनुष्य……….…. ॥

किसी से नंबर की , किसी से भगवान की,
किसी से पुत्र की ‘ किसी से राज की बात करता है , ।
खुद को बताता है, भविष्यवक्ता
तो कभी भगवान का सेवक ,
मंगाने क्या छीनने के नये नये तरीके ‘
इजाद करता है, I
कहता है कि इंसान के लिये अरदास करता है ।
क्योंकि मनुष्य……………… ॥

मगर जो 300में 600 का काम करता है,
उसे 300 देने से दिल दुखता है ,
क्योंकि सारे विकास का, उसी से समाज का पाहिया रुकता है ।
लगे इज्जत को बट्टा हो समाज में ठट्टा ,
हो कमजोर या पट्ठा , उससे नहीं झुकता , I
क्योंकि मनुष्य…………….. ॥

कह दूँ क्या ऐसे समाज को ‘
क्या कल को क्या आज को,
नजदीकी या दूरदराज को ‘
या अन्जाने अनपढ समान को,
या ज्ञान को या अभ्यास को ‘
जो मिटादे दिलों से अपनापन
या अपनेपन के आभास को ‘ ।
क्योकि मनुष्य……………. ॥

Leave a Comment

Connect with



Join Us on WhatsApp