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व्यंग्य-लेखःः इंटरनेट पर साहित्य-सम्मेलन-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-लेखःः
इंटरनेट पर साहित्य-सम्मेलनःः
साथियो, आपको यह जानकर खुशी होगी कि मैंने एक इंटरनेट गु्रप का गठन कर रखा है, जिसमें वे सभी कवि सम्मिलित हो सकते हैं, जो कविता करना जानते हैं। गु्रप का नाम है-‘इंटरनेट पर साहित्य।’
मित्रो, आजकल साहित्यकारों की हालत पतली हो गई है। वे लिख-लिखकर परेशान हैं, लेकिन उनकी किताबों को प्रकाशक छापने से उसी तरह कतरा रहे हैं, जैसे किसान आंदोलनकारियों से सरकार बात करने से कतराती रही है। किसान, न जाने कौन-सा नया शिगुफा छोड़ दे और सरकार के हाथ-पांव फूल जाएं।
साहित्यकारों का रोना है कि वे लिखे नहीं, तो खाली-पीली बैठकर क्या करें? उनसे मक्खी भी नहीं मारा जाता। धांस और आलू भी नहीं छिला जाता।
वे किसानों की माफिक हड़ताल भी नहीं कर सकते है। उनके लिए आंदोलन स्थल पर फाइवस्टार सुविधाएं जुटाना तो दूर, उसके बारे में सोच तक नहीं सकते। वे ट्रेक्टर-ट्रालियों में, धरनास्थलों में, आलीशान ताज होटल जैसी सुविधाएं कहां से जुटाएं?
उन्हें न कोई राजनीतिक पार्टी धांस डालता है, न विदेशों से कानी कौड़ी मिलता है, तो वे किसके दम पर आंदोलन का खम भरें। वे हड़ताल करें भी, तो किसके खिलाफ ‘भिया’?
साहित्यकारों में इतना भी दमखम नहीं कि मोबाइल टावरों को क्षति पहुंचाकर इंटरनेट, एटीएम, मोबाइल सिस्टम और बच्चों की पढ़ाई को प्रभावित कर सकें। उनमें ऐसा भी हौसला नहीं कि अपराधियों को जेल से बरी करने की मांग कर सके।
वे तो इतने पस्तहिम्मत हैं कि पराली जलानेवालों और बिजली चोरी करनेवालों को चोरी और सीनाजोरी नहीं सिखा सकते? न ही गणतंत्र दिवस पर राजधानी को बंधक बनाने और लाल किले पर झंडा फहराने का ताल ठोंक सकते हैं।
इधर, प्रकाशकों का सुबकना है कि जब पढ़नेवाले ही नहीं, तो किताब किसके लिए छापें? रद्दीवाले भी अब किताबें लेने से मना कर रहे हैं; क्योंकि कागज के कारखानों में कोरोनावायरस की संतानें उनको लीलने के लिए बैठी हुई हैं। लिहाजा, वे बंद पड़े-पड़े गम के आंसूं बहा रहे हैं।
फलतः, लेखन व प्रकाशन दोनों धंधा, मंदा पड़ा हुआ है। उनकी रचनाओं को न कोई पाठक देखता है, न पढ़ता है।
कोरोना ने ऐसा चक्र चलाया है कि जो बेचारे समाचारपत्र और पत्रिकाएं विज्ञापनों के दम पर चहकती थीं, वे विज्ञापनों के अभाव में भीगी बिल्ली बनी हुई हैं। उनका भट्ठा बैठा हुआ है।
इसीलिए, यह निहायत जरूरी हो गया है कि एक ऐसा ग्रुप बनाया जाए, जिसमें लेखक ही पाठक हों और पाठक ही लेखक! एकदम डबलरोल वाली फिल्मों की तरह। बिल्कुल जुड़वा भाइयों की मानिंद। खलनायक बना नायक की माफिक।
न पाठक ढूंढने की जहमत, न लेखक खोजने की मशक्कत। दोनों, एक ही मंच पर मिल जाएं, तो सोने पे सुहागा हो जाए।
आजकल दुनिया में यही हो रहा है। जब मतदाता ही नेता, अभिनेता, कर्ताधर्ता और साजिशकर्ता हो, तब लेखक ही पाठक या पाठक ही लेखक और गु्रप एडमिन क्यों नहीं हो सकता? यह कोई अचरज की बात नहीं। फिर पढ़ने-लिखने में चोली दामन का साथ भी रहा करता है, भाईसाहब।
…और-तो और; अब कविता को पढ़ना छोड़ो; उसकी गंभीरता को समझनेवाले लोग भी नहीं मिलते हैं। फलस्वरूप, कवि और लेखक टेंशन और डिप्रेशन में जाने लगे हैं। यह साहित्यजगत के लिए बड़ी क्षति है।
सो, उन्हें मैंने मानसिक तौर पर दिवालिया होने से बचाने के लिए इंटरनेट ग्रुप का गठन किया है। चाहें, तो आप भी इसमें शामिल होकर हमारे ग्रुप की शोभा बढ़ा सकते हैं।
ऐसा गु्रप बनाने का एक ध्येय यह भी कि अब साहित्यकारों की जमात ‘वाहवाही’ देने में आत्मनिर्भरता को प्राप्त हो गई है, जो वह बेझिझक ‘वाह! शुभानअल्लाह!!’ सरीखी वाहवाही खुद ही दे लेती है।
सभी मिल-जुलकर जहां व्यंग्य पर ठहाके लगा लेते हैं, वहीं कविता को ‘धांसू’ और ‘वाह, क्या खूब!’ कविता कहकर कहकहे लगा लेते हैं!
वे सब समवेत स्वर में ‘‘बहोत अच्छा और भोत बढ़िया’’ टाइप की हंसी भी हंस लेते हैं, जिससे ‘‘कवीता के रचियता’’ का मजा दोगुना हो जाता है।
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