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व्यंग्य-कथा:: बड़ी मछलियों की चिंता बड़ी-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-कथा::
बड़ी मछलियों की चिंता बड़ी::
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के एक बयान से बड़ी मछलियों में हड़कंप मचा गया। वे कूदने-फांदने व दौड़ने-भागने लगे। खुद को छुपाने और बचाने के जतन करने लगे कि कहीं किसी कपटजाल व मकड़जाल में फंस न जाएं। वे दहशतजदा थे कि किसी झांसे में न आ जाएं।
लिहाजा, सबने समंदर में एक सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमंे तमाम जलस्त्रोतों के प्रतिनिधि जोश-ओ-खरोश से शरीक हुए। महासागरों और खाड़ियों से भी बीसों प्रतिनिधि दौड़े-भागे चले आए।
सम्मेलन के लिए मगरमच्छों से भी अनुरोध किया गया कि वे अपने डीलडौलपने का इस्तेमाल करते हुए उनके गाडफादर बन जाएं।
‘‘हाल के माहौल से सबको पता चल गया है कि अब भ्रष्टाचरण के वजूद को खतरा पैदा हो गया है।’’ प्रधान ने गंभीरता का लबादा ओढ़कर व्यथित मन कहा,‘‘अगर हम अभी नहीं जागे और संगठित विरोध नहीं किए, तो लूट-खसोट करने का हमारा अरमान धरा-का-धरा रह जाएगा। हम कहीं के नहीं रहेंगे। हमारे साथ बेचारी छोटी मछलिया भी बेमौत मारी जाएंगी।’’
प्रधान ने छोटी मछलियांे की मुखाबित होते हुए कथन जारी रखा, ‘‘आखिरकार, हमारे संरक्षकत्व में ही छोटी मछलियां जीती-खाती हैं। हमारा ग्रास बनकर तथा बनवाकर हमारी पेट पूजा करती रहती हैंै।’’
‘‘उनकी एैसी-की-तैसी! ऐसे कैसे पकड़ लेंगे, वे हमें!! हम भी कोई कच्ची गोटियां नहीं खेले हैं, जो उनके हाथ आएंगे।’’ तभी एक शार्क वत्स समंदर में गोते लगाते हुए चीखा, तो सबका कलेजा मुंह को आ गया।
यह देखकर हमउम्र शार्कों ने उसे खींचकर बिठा दिया,‘‘अबे बैठ, बड़ा तीसमारखां बनता है! जब सपड़ में आएया, तब सारी हेकड़ी निकल जाएगी। भ्रष्टाचार निरोधक कानून के शिकंजे में फंसकर जिंदगी हलाक हो जाएगी!’’
‘‘यूं बोलो कि कैदखाने में पड़े-पड़े सड़ जाओगे। लेकिन, किसी के कुछ काम नहीं आओगे। न निवाला बनोगे, न हवाला।’’ एक मसखरे शार्क ने दिल्लगी किया, तो समंदर हंसी के ठहाकों से गूंज उठा।
हंसी-ठिठोली से आमतौर पर दूर रहनेवाला मगरमच्छ भी मंद-मंद मुस्कराए बिना रह नहीं सका।
‘‘यारों छोड़ो ये हंसी-ठठ्ठा! हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। हम साजिश के शिकार होकर अस्तित्वविहीन होने जा रहे हैंै।’’ प्रधान ने सबको चेतावनी देते हुए कहा।
‘‘आपकी फिक्र स्वाभाविक है, प्रधानजी।’’ एक व्हेल बीच में टोका, तो सबने अपनी गरदन उधर धूमा लिया कि ये महाशय हैं कौन, जो फिक्रमंद हैं।
व्हेल कहने लगा, ‘‘हमें हरदम सावधान और सतर्क रहना चाहिए। यदि किसी जलाशय में छापामारी की जरा-सी भी भनक लग जाए, तो एक-दूसरे को खबर कर देनी चाहिए। आजकल मोबाइलेें सबके पास हैंै। सूचना लेने-देने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए। जरा-सा ट्वीट कर देना सबका दायित्व बनता है।’’
‘‘बजा फरमाया आपने!’’ एक रोहू सहमति के स्वर में बोला,‘‘ताकि कोई शिकारी, शिकार करने आए, तो उसे कुछ न मिले। वह बैरंग लौट जाए।’’
‘‘खुदा न खास्ता; कोई बदनसीब किसी कानूनी जाल में फंस भी जाए, तो उस जाल को काटने का हमंे हर संभव प्रयास करना चाहिए।’’ अबकी खाया-पीया एक बूढ़ा कतला बोला।
इसपर जोशखरोश से भरे युवा मृगल ने उसे सांत्वना देते हुए कहा,’’बाबाजी, क्यों चिंतातुर हैं, आप? हम हैं न! हम सबको आश्वस्त करते हैं कि अव्वल तो ऐसा होगा नहीं! क्योंकि गरजनेवाले बादल बरसते नहीं। फिर थोथा चना बाजे धना की मानिंद धीरे-धीरे सब कुछ ठंडा पड़ जाएगा। हम फिर-फिर बेईमानी के सागर में गोते लगाया करेंगे।’’
इतने में वयोवृद्ध कतला ने सुझाया, ‘‘अब, आप चिंता छोड़ें और खूब बेईमानी कर सुख से जीएं। मैंने कई जांबाज मछलियों को प्रशिक्षित कर खुफिया एजेंसियों और व्यूरोेज की नौकरियों में स्थान दिलवा दिया है। वे भ्रष्टाचार-निरोधी गतिविधियों पर निगेहबानी करेंगी और छापेमारी की भनक लगते ही हमें सूचित कर देंगी। इससे हमें अपना बचाव करने का अवसर मिल जाएगा। इसलिए आपलोग निष्फिक्र रहकर बेईमानी के सागर में पूर्ववत गोते लगा सकते हैं।’’
सम्मेलन समापन की ओर था। चर्चाएं सार्थक हो चुकी थीं। इसलिए प्रधान ने मगरमच्छ से आग्रह किया कि वे आएं और अपने सारगर्भित उद्बोधन से हमारा न केवल मार्गदर्शन करें, अपितु संकटमोचन बनकर हमें अनुगृहीत भी करें।
मगरमच्छ ऐसे इतराते हुए आया, जैसे नया-नवेला नेता पदधारण करने के बाद इतराता है, जो अपने-आप को खुदा से कम नहीं समझता है।
वह बोला,‘‘मुझे आप सबको आश्वस्त करते हुए, यही कहना है कि हमें गीदड़ भभकियों से धबराना नहीं चाहिए। अब तक कितने भाषणबाज आए और भाषण देकर चले गए; मगर हम भ्रष्टों का बिगाड़ नहीं सके। हां, अब हमें ज्यादा सतर्क रहना चाहिए। अपने-आप को इतना दमदार, दिमागदार और धमाकेदार बनाकर रखना चाहिए कि किसी तरह की मुसीबत आए, तो हम उसका सामूहिक रूप से मुकाबला कर सकें।’’
उसने अपने लोगों की ओर निहारते हुए कहा, ‘‘हमारी बिरादरी आपलोगों के साथ है। हम हरदम संरक्षण देने के लिए तत्पर हैं। इसीलिए डर काहे का! जाओ और जमकर अंधेरगर्दी मचाओ।’’
इस तरह सम्मेलन का सार्थक समापन होने जा रहा था। मछलियां गलबहियां करने लगीं। नाचीं-गाईं और अपने ठौर-ठिकाने की लौट गईं और बढ़-चढ़कर बेईमानी के समंदर में डूबकियां लगाने लगीं।
इसके बाद कोई बदनसीब पकड़ा भी गया, तो वह कानून के जाल की छिद्रता की वजह से छूटता चला गया। भ्रष्टाचार समाप्त होना दिवास्वप्न बन गया।
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