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महिलाओं में मेकअप का जुनून-अंजना झा

महिलाओं को ईश्वर ने वाकई बहुत तसल्ली से बनाया। हर सुंदरता हर कोमलता उसमें भर दी। जहां इकट्ठी होती हैं चार महिलाएं वाकई बागों में बहार आ जाती है। पर इतनी खूबसूरती के बावजूद हम महिलाओं को सजने संवरने का कुछ खास ही शौक होता है। और इक महिला होने के नाते मैं भी इसका समर्थन करती हूँ कि अगर ईश्वर ने रूप और नजाकत दी है तो उसे संवारना भी चाहिए। पर किसी किसी में यह एक जुनून हो जाता है और फिर तो उन महिलाओं को सामान्य वेशभूषा में पहचान ही नहीं सकते आप।
इसी क्रम में एक घटना याद आ रही मुझे। उस समय हम झारखंड में सरकारी आवास में थे। सावन का महीना था।पठारी इलाकों में तो बारिश का अपना ही मजा होता है। उस दिन सुबह से ही झमाझम बारिश हो रही थी।
बच्चों के विद्यालय जाने का वक्त और बारिश थमने का नाम न ले रहा था। फिर सभी ने कार्यालय से गाड़ी मंगवाई ताकि बच्चे विद्यालय जा सकेंं। दूसरी गली में हमारी सहेली नीतू रहती थी हमने गाड़ी वाले को उनके बच्चों को भी लेने को भेजा। जब वो अपने बच्चों को गाड़ी में बैठाने आई तो किसी ने उन्हें नमस्ते नहीं किया। बच्चे तो छोड़ो ड्राइवर और कंडक्टर तक ने नहीं। उन्हें इतना बुरा लगा कि उन्होंने इसकी शिकायत सभी के अभिभावक से कर दीं। और जब सभी ने अपने बच्चों को डांटा तो बच्चों ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया नीतू अंटी तो आई ही नहीं थी गाड़ी में अपने बच्चों को बैठाने वो तो इक काली सी आंटी थीं। नीतू आंटी तो बहुत गोरी हैं। फिर हमें समझते देर नहीं लगी कि सुबह सवेरे नीतू को अपने चेहरे को रंगाई पुताई का वक्त नहीं मिला।।अत्यधिक और हरवक्त मेकअप करने की शौकीन नीतू को बिना मेकअप किसी ने पहचाना ही नहीं।।। और आजतक मेरा बेटा इसी सवाल में उलझा हुआ है कि नीतू आंंटी काली से गोरी कैसे बन जाती थींं।

 

  Anjana Jha

       अंजना झा

फरीदाबाद,  हरियाणा

 

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Anjana jha

Anjana jha

मैं अंजना झा मुलत: बिहार की हूँ। परन्तु वर्तमान में फरीदाबाद हरियाणा में रहती हूँ | वर्तमान में साहित्य लाइव पत्रिका में संपादक के पद पर कार्यरत हूँ। पूर्व में आकशवाणी में अंत: वार्ताकार रह चुकी हूँ। मैंने आर्मी पब्लिक स्कूल और मनस्थली पब्लिक स्कूल में बतौर शिक्षिका कार्य किया है। मैंने केंद्रीय विधालय में काउंसलिंग का भी कार्य किया है। मैं विभिन्न पहलुओं पर लिखती हूँ। आज मेरी विशेष रूप से कवियत्री के रूप में पहचान है।

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