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ग़ज़ल – ए – गुमनाम-डॉ.सचितानंद-चौधरी

              ग़ज़ल-21 

मेरी ग़ज़लों की साज़ हो , नाज़ हो तुम
मेरी साँस हो तुम , मेरी आवाज़ हो तुम

मेरे वक़्त के आइने में ज़रा देखो तो
गरीबी में कर्ज़ , अमीरी में ब्याज़ हो तुम

आहिस्ते से ख़ुशबू कह गयी कानों में
सुर्ख़ फूलों की मासूमी के राज़ हो तुम

यूँ तो हर दर्द की दवाएँ हैं बहुत मगर
मेरे दर्दे-दिल का सिर्फ़ इक़ इलाज़ हो तुम

ज़माने ने लगाये ज़ो भी इल्ज़ाम मुझपर
हर उन इल्ज़ामों की हसीन आगाज़ हो तुम

ख़्वाबों में तराशा”शशि” कभी ज़ो ताज़महल
शाहज़हाँ हूँ मैं उसका मेरी मुमताज़ हो तुम

लेखक- डाॅ सच्चितानन्द चौधरी ” शशि ”
दिनांक- 16-12-1992

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