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ग़ज़ल – ए – गुमनाम-डॉ.सच्चितानंद चौधरी

                    ग़ज़ल-12

ग़म के मारों का बयान लेने निकले हैं
हम अपना ही इम्तेहान लेने निकले हैं

अपने कात़िले-दिल की तलाश में आज़
मुआयना -ए- कब्रिस्तान लेने निकले हैं

देखके कारवाँ मेरा रहगुज़र कहने लगे
लगता है ये अपनी जान लेने निकले हैं

कह रही है ख़ामोशी प्यासे मयक़सों की
ऐ शाकी हम तेरा एहसान लेने निकले हैं

ज़माने के गर्दिशों से क्या ड़रना ‘शशि ‘
हम तो अपना आसमान लेने निकले हैं

लेखक-डाo सच्चितानन्द 'शशि'

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