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लाचारी – ( ऊंचे मुकाम को हासिल करने के लिए संघर्ष करते वक्त एक लाचार मानव की व्यथा )-आर्यन सिंह यादव

मंजिल तक जाने वालों का कोई दूजा ठौर नहीं है परख लिया लाचार परिंदा मुझ सा और नहीं है

आसमान दिख रहा सामने किस्मत दमक रही है
ध्रुव तारा बन करके हमारी मंजिल चमक रही है

संघर्षशील मानव पर कोई करता गौर नहीं है
परख लिया लाचार परिंदा मुझ सा और नहीं है !!

चलते चलते थका बहुत और मंद पड़ गया तन मन
व्यर्थ में क्यों ? बर्बाद कर लिया अपना सारा जीवन

मगर हमारी आत्मशक्ति अब भी कमजोर नहीं है परख लिया लाचार परिंदा मुझ सा और नहीं है !!

बैठ रहा हूं शांत यथावत अनुभव मिला नहीं है
खूब सजाया बाग फूल पर अब तक खिला नहीं है

धड़क उठा अब ह्रदय आज उल्फत का शोर नहीं है परख लिया लाचार परिंदा मुझ सा और नहीं है !!

कोई तो जी रहा जिंदगी व्यभिचारी राहों में
किसी किसी का बना ठिकाना प्रकृति की बाहों में

मजबूरी बढ़ गई आज उल्फत का शोर नहीं है
परख लिया लाचार परिंदा मुझ सा और नहीं हैं !!

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