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लेखन की चुनौतीः भाग-5 ‘ये-ए’ और ‘यी-ई’ का चक्कर-वीरेंद्र देवांगना

लेखन की चुनौतीः भाग-5
‘ये-ए’ और ‘यी-ई’ का चक्कर::
हिंदी भाषा में अज्ञानता के कारण ‘ये-ए’ और ‘यी-ई’ दो तरह-तरह की वर्तनियां लिखी जा रही हैं। कोई लेखक आये-आए, खाये-खाए, गये-गए, दिये-दिए लिखता है, तो कोई नये-नए, चाहिये-चाहिए, कहिये-कहिए, समझिये-समझिए। ऐसा ही जायेगा, जावेगा और जाएगा; जायें, जावें और जाएं का तीन रूप चलन में है। यही हाल, गयी-गई, नयी-नई लिखने में दिख पड़ता है।
स्तरीय समाचारपत्रों व पत्रिकाओं में हमें ‘ए’ और ‘ई’ रूप देखने को मिलता है, जो सही प्रतीत होता है और व्याकरण-सम्मत लगता है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने भी ‘ए’ और ‘ई’ वाले रूपों को लिखने की अनुशंसा की है।
सुप्रसिद्ध भाषाविद् डा. भोलानाथ तिवारी, आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पाण्डेय और अन्य अनेक भाषाविज्ञानियों का अभिमत है कि मूल धातु ‘या’ न होकर ‘आ’ है, जो उच्चारणिक सुख के चलते ‘या’ हो गया है। ‘आ’ का बहुवचन रूप ‘ए’ होता है। इसलिए गया, खाया, पीया, दिया एकवचन की दृष्टि से तो सही होगा, लेकिन इसका बहुवचन रुप गए, खाए, पीए, दिए होगा, न कि गये, खाये, पीये और दिये रूप।
इसी तरह ‘आ’ का स्त्रीलिंगी रूप ‘ई’ है, न कि ‘यी’। इसीलिए गया का स्त्रीलिंग रूप बनाने में ‘ई’ का प्रयोग किया जाकर ‘गई’ लिखा जाएगा। यही स्थिति खाई, खिलाई, दिलाई, सुलाई, सिलाई आदि रूप में भी परिलक्षित होगी।
गौरतलब यह भी कि ‘ए’ और ‘ई’ रूप का व्याकरणिक नियम संज्ञा, विशेषण, क्रिया, क्रियाविशेषण और अव्यय आदि सभी शब्द रूपों में लागू होता है।
लेकिन, यहां इसके अपवाद भी हैं। इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। जो शब्द मूलरूप से ‘य’ अंत वाले हैं, उनका मूलरूप ही रहेगा। उसमें परिवर्तन नहीं किया जाता। जैसे-परायी, स्थायी, न्यायी, आततायी, उत्तरदायी, फलदायी, विषयी, सुखदायी, दुःखदायी, रहस्यमयी, ममतामयी आदि।
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