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मानव का सुख-वीरेंद्र देवांगना

मानव का सुख::
एक बार एक व्यक्ति महान् वैज्ञानिक आइंस्टीन से जानना चाहा,‘‘विज्ञान ने मानव के लिए तमाम सुख-सुविधाओं के साधन मुहैया करा दी है। यातायात के विकसित साधनों से दुनिया सिमट गई है। हम पलक झपकते ही दुनिया में किसी से भी बात कर सकते हैं। किंतु, इंसान संतुष्ठ नहीं है। उसमें असंतोष, अशांति, बुराई और कलह पहले की अपेक्षा और बढ़ गई है। इससे तो उसे सुखी और शांत रहना चाहिए था।’’
आइंस्टीन ने जवाब दिया,‘‘वस्तुतः हमने शरीर को सुख पहुंचानेवाले साधनों का आविष्कार और विकास तो किया, लेकिन हम भूल गए कि इस तन के अंदर एक मन होता है, जिसका विकास तो त्याग, ममता, करुणा, स्नेह, प्रेम जैसी संवेदनाओं को जगाने से ही संभव है। मनुष्य यहीं भूल करता है और अशांत रहता है। जिस दिन मनुष्य मन-मस्तिष्क के आंतरिक आनंद को प्राप्त कर लेगा, उस दिन से विज्ञान के ये आविष्कार उसके लिए वरदान साबित होेंगे।’’
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