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व्यक्तित्व विकास के फायदे-2-वीरेंद्र देवांगना

व्यक्तित्व विकास के फायदे-2
आशय यह कि हम दिखने में तो शरीर मात्र दिख रहे हैं, पर असल में हम केवल शरीर नहीं हैं। इस चोले के अंदर हमारे पास बहुत-कुछ है, जो शरीर को नियंत्रित व संचालित कर रहा है। इसीलिए कहा जा रहा है कि जो हम हैं, वो हम नहीं हैं।
दूसरे, हमारे तन के गहरे में ‘मन’ विद्यमान है, जो दिमाग के माध्यम से तन को काबू में करने का काम करता रहता है। ताकत तन के पास है, पर उसका संचालनकर्ता मन है। मन ही, तनरुपी वाहन का चालक है।
तभी तो, जिस काम को ‘मन’ करना चाहता है, वह आसान नजर आता है। जिसे ‘मन’ करना नहीं चाहता, वह कठिन लगता है। जब मन करता है, तो नामुमकिन कार्य भी मुमकिन हो जाता है। मन नहीं करता, तो मुमकिन कार्य भी नामुमकिन प्रतीत होता है।
हैरतअंगेज कर देनेवाले कार्य इसी श्रेणी में आते हैं। हम देखतेे हैं कि कई लोग दांतों से ट्रक खींच लेते हैं। कमर से ट्रेन रोक लेते हैं। दुर्गम पहाड़ों पर चढ़ जाते हैं। महासागरों को तैरते हुए नाप लेते हैं। मौत के कुएं में छलांग लगा लेते हैं। बाधादौड़ व फर्राटादौड़ में अव्वल आ जाते हैं। खेलकूद व पढ़ाई-लिखाई में बाजी मार ले जाते हैं।
असंभव दिखनेवाले इन करतबों के पीछे मन की शक्ति का बहुत-बड़ा हाथ होता है। कहा भी गया है। मन के हारे हार है; मन के जीते जीत। जिसके मन में जीत का जज्बा है, उसका तन-मन इसी जज्बे के सामथ्र्य से जीतेगा। जिसका मन निराशा में डूब चुका है, उसका तन-मन हताशा के चलते हारेगा।
अतः व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए अपने मन को नियंत्रित करते रहें और उसे उसी काम में लगाएं, जो आप बनना चाहते हैं, तभी आप मनरूपी शक्ति का लाभ उठा पाएंगे
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