।।आँखें भिगोती रातें।। – अभी राजा फर्रुखाबादी

।।आँखें भिगोती रातें।। – अभी राजा फर्रुखाबादी

करूँ कैसे वयां उन दिनों की बातें
करूँ क्या किससे मै दर्दों की बातें

हम उनको थे चाहते वो हमसे थे जलते
वो मुस्कुराते थे मुझपर हम रोते थे उनपर

आज फिर वो याद हैं आते
आज फिर वो पल पल हैं रुलाते

मेरी आंखों से अब पानी वो चुराते
क्या बताऊं वो कितना हैं रुलाते

इस जिस्म से खुशबू वो चुराते
मुझसे ही छीनकर वो अपना घर बनाते

दर दर मेरे पाओं हैं भटकते
रोके से भी लहू न अब रुकते

क्या क्या सितम वो मुझ पर करते
मेरे तन को जलाकर शायद महल बनाते

हम कितना उनको समझाते
जुवां से क्या हम ईश्वर बन जाते

जाने से पहले कितना फुसलाते
वो मेरे होते तो यूं न मुझे ठुकराते

अब हर रात सताती उनकी बातें
वो कहाँ गया देकर मुझे तन्हा रातें

अफसोस मुझे है सुन उनसे माते
बो एक बार जरा पीछे तो मुड़ जाते

गलियों को अपनी वो अब रोज़ सजाते
मुझको गम से खुदको खुशियों से सजाते

अब आंखें भिगोती हैं रातें
मै कैसे भुलाऊं वो प्यारी प्यारी बातें।।

अभी राजा फर्रुखाबादी
फर्रुखाबाद, उतर प्रदेश

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comments
  • NiCe poem…..👌👌

    0

  • Suppervv bhai. …good

    0

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