अधुरी उड़ान – रवि कुमार

अधुरी उड़ान – रवि कुमार

पर फैलाए थे हमने आस्मा मे उड़ जाने को ।
उपर से फरमान आया ह उन्हे कुतर जाने को।।
आसु हमारे भी निकले ना जाने क्या पाने को।
जो था ही ना अपना उन्हे अपना बनाने को।।
ये जँहा भी उधार की ये जिन्दगी भी उधार की।
फिर क्यो नही जाते ये उधार चुकाने को।
क्यो फैलाये ही थे ये पर खुद को उड़ा ले जाने को।।

रवि कुमार
गुरुग्राम्
हरियाणा

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