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अहिंसक-साथी टी

अहिंसा का परमार्थ निकेतन मन है
दूसरे के लिए अपने विचार हैं कि दुर्भावना से रहित है
जीवन में अंत तक निभाने में सक्षम हो सकता तो अहिंसक है
समाज में व्याप्त अत्याचार के खिलाफ कदम उठाना समाज सेवी का धर्म है
समाज के बदनीयत पर क्षुब्द भावना पैदा करना साहित्यकार का धर्म है
अपने कलम उठा कर ऐसे करने से इतिहास भी बन गई और बदल कर रख दी
शासन जनतंत्र हो या अन्य किसी भी हों अत्याचार देखने पर निस्संगभाव रहे हैं
तो उच्जृंखल शासन के नीचे पिस जाने की मौका अपने आप ही खोल दी जाती है

  • डॉ सती गोपालकृष्णन

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