किस्तों में मौत – सीमा पोद्दार

किस्तों में मौत – सीमा पोद्दार

छोटी सी पुड़ियों में ,जहर का बिक्री सरेआम हो गया।
तभी तो मौत का किस्तों में, इंतजाम हो गया।

जुबां के साथ दिल, भी खूब जालाते हो।
कुछ ही वक्तों में टी: वीं कैंसर ,जैसी बीमारी को बुलाते हो।
भगवान की दी हुई सुंदर ,शरीर अब बस बीमारियों के नाम हो गया।

तभी तो मौत का किस्तों, में इंतजाम हो गया।

जहां छोड़ा तूने अपनी अच्छाई को, वही क्यों ना इस बुराई को छोड़ आते हो
ऐसा क्या है इस तंबाकू में ,गुटके में जो अपने बच्चों की कसम भी तोड़ जाते हो।
लगता है तुम और तुम्हारी, आत्मा पूरी तरह से इसका गुलाम हो गया

तभी तो मौत का किस्तों में, इंतजाम हो गया।

अपने रुप और यौवन की भी परवाह नहीं, अपनी उम्र से दुगने हो दिखते।
आखिर कब तक सहेगा नाजुक दिल, जहरीली दुआ से वो भी है घुलते।

कुछ ना बचा अब तेरे शरीर के अंदर, लगता है पैमाने से जैसे खाली जाम हो गया।
छोटी सी पुड़िया में ,जहर का बिक्री सरेआम हो गया।
तभी तो मौत का किस्तों में, इंतजाम हो गया।

सीमा पोद्दार

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