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महाकाल – अशोक सिंह

हर वार में, हर सार में
हर जीत में, हर हार में
हर प्रेम में ,सृंगार में
अवतार में , उद्धार में
बस एक नाम , ही सदा
जीवन के इस अभिसार में ।

हर कर्म में सत्कर्म में
हर हास में परिहास में
हर बृद्धि में विकाश में
हर साँस में, सन्त्रास में
बस एक नाम ही सदा
जीवन के इस आभास में ।।

वो कुशुम में कन्टक में भी
वो तरु धरा और वात में
वो आस में उल्लाष में
वों ही है अन्तिम साँस में
बस एक नाम ही सदा
जीवन के इस आभास में ।।

ये अलक है या व्यंजना
या मर्म का साक्षात है
क्यूं प्रेम में है अब चुभन
कलुषित ये सारी वात है
बस एक नाम ही सदा
ईश्वर तेरी सौगात है ।।

Ashok Singhअशोक सिंह
आजमगढ़ उत्तरप्रदेश

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Ashok Singh

Ashok Singh

मैं अशोक सिंह गोरखपुर उत्तरप्रदेश का निवासी हूँ। मैं श्रृंगार रस का कवि हूँ।

4 thoughts on “महाकाल – अशोक सिंह”

  1. 23270 113660Making use of writers exercises such as chunking. They use a lot of websites that contain several creative writing exercises. Writers read an exercise, and do it. 668908

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