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मुझ में देखा वो हुनर क्या था~ प्रिया चतुर्वेदी

तेरे सीने में जज्बात ठहरे बहुत हैं
लगता है दिल में जख्म कुछ गहरे बहुत है
मेरे अल्फाज तेरी जुबान तक आए तो कैसे
तेरे होठों पे आजकल खामोशी के पहरे बहुत है

हर रात गुजर रही है इसी कशमकश में
जो तूने देखा मुझ में बो हुनर क्या था
आज राहें जुदा है जिंदगी की मगर
जब साथ चले थे बो सफर क्या था

छुपा रखे हैं कई समंदर निगाहों में
बसा रखा है हमने देवता अपने गुनाहों में
तुम लौट कर वापस ना आओगे यह सोचकर
बना रखा है रेत का घर इन राहों में

मेरे अपने जब मुझसे मेरा हाल पूछने आते हैं
यकीन मानो वो नजरों में कई सवाल पूछने आते हैं
हमने भी तारूफ कराया मुस्कुराकर खुद से
यह क्या कम है जो मेरा हाल पूछने आते हैं

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