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‘ प्रश्न – अजय-प्रताप सिंह

पूछ रही है आज संस्कृति प्रश्न एक ।
क्यों कर ना सके तुम इस अबला की देखरेख ॥
मैं आभूषण जननी का हूं
पापी भ्रष्ट कमीनों ,
सदियों में सज पाई थी
यह आभूषण मत छीनो ,
मां से ममता का अंकुर
क्या रहा नहीं अब शेष ।
क्यों कर ना सके तुम इस अबला की देखरेख ॥
जिससे मां को आजाद किया
लाये बिठा तुम डोली में,
फिर से मां को जला रहे क्यों
उसी पाश्चात्य की होली में ,
क्या मां की अस्मत बेच बनोगे बड़े शेख |
क्यों कर ना सके तुमइस अबला की देखरेख ॥
सिर्फ किताबों तक सीमित है
जग में अब गणना मेरी,
मां का सौंदर्य मुझी से था
नग्न हुई जननी तेरी ,
नहीं मिलेंगे आंसू लेकर ढूंढोगे मेरे अवशेष |
क्यों कर ना सके तुम इस अबला की देखरेख ॥
अरे कपूत बेच अस्मत को
निश्चिंत भाव से सोता है,
आवाजें दे जगा रही मां
जागो नर्वस दिल रोता है ,
वस्त्रहीन खड़ी माता मुझको पहुंचा आघात देख |
क्यों कर ना सके तुम इस अबला की देखरेख ॥

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