शायरी-ओमकांति

शायरी-ओमकांति

1-जिन्दगी की हर सजा हमे मन्जूर है । प्यार भी दूर है लाल भी दूर है । मेहरबानी है दवा की जो हम जिन्दगी से मिलते है ।वरना यहां तो जख्मो का दस्तूर है ।
दर्द की दुल्हन बनी,जख्मो सी सुहागरात थी ।
2-आंशुओ की जिंदगी थी, आंखो मे एक जाम था ।आता ही नही हमको यकीन अपनी मजबूरी पे कि आखिर क्यो। मर -2 के जीने के लिए दिल ये मजबूर था
ओमकांति 

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