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टिमटिमाते दीप-संतोष सिंह ” क्षात्र “

पुरूषोत्तम हैं पधारे, झूमे पूरा समाज।
खुशियों की लड़ी पसरी,मगन अयोध्या आज।।

कुंच गली लागे दूल्हन, घर-आंगन में ठाट।
जगमग घी के दीपक, प्रफुल्लित सरयू के घाट।।

दसशीश हर प्रभू ने किया भक्तो का उद्धार।
पग-पग दीया झलमल, मिट रहा अंधियार।।

सोंधी महक घुल रही,बहे पवन झकझोर।
भागे भागे आगये जैसे तारे धरती की ओर।।

छाजन ओढ़े उजियाली ,भयी स्वर्ण शालिका छोर!
कोने कोने में टिमटिमाते दीप, झूमे पोर पोर।।

#क्षात्र_लेखनी @SantoshKshatra

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