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रिश्तो का अहसास - रिश्ते ऐसे भी मिलते हैं जग में यहां

Poonam Mishra 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक रिश्तो का अहसास 38947 0 Hindi :: हिंदी

रिश्ते ऐसे भी मिलते हैं जग में यहां 
कुछ बनते हैं और कुछ बिगड़ते यहां 
 सांस की डोर है आ रही जा रही है 
यह किसी के भी रोके तो रुकती नहीं 
कितना रोता है यह आकाश 
धरा के लिए 
प्यास ऐसी लगी है 
जो बुझती नहीं 
लाख चाहे अगर बरस ले बादल आज
आज कुछ बूंदे बरसती है 
और कुछ बरसती नहीं है
 किसे मैं अपना किसे मैं पराया कहूं
 सोचती हूं अभी यह सब फिजूल की बात है 
आंख खुलती है तो दिन हो चला है यहा 
आंख लगती है तो रात का एहसास है 
आंखों में सपने को कैसे सजाएं 
कुछ सपने हैं जो कुछ बिखरते हैं 
और कुछ बिखरते नहीं
 राह में कुछ लोग ऐसे मिले 
कुछ याद आते हैं और कुछ याद आते नहीं 
आंधी ऐसी चली है धरा पर यहां 
जैसे बनते बिगड़ते हैं रिश्ते यहां

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