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मां का आंचल अवर्णित है
धूप घाम में यह छाता है, रोने लगे तो रूमाल। मां का आंचल अवर्णित है, यही मां का कमाल।। नींद आयी तकिया बनकर, बेटे को सुलाया। मां ने आकर आं�
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उम्मीद की कश्ती
उम्मीद की कश्ती में सवार, दुनिया के समंदर में निकला हूं मैं। हर तरफ लगा है मेला, फिर भी तन्हा अकेला हूं मैं। परवाह नहीं मुझे, मंजिल म�
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बहाने बहुत हैं
बहाने बहुत हैं अपनी नाकामी छुपाने को, माचिस की एक तीली काफी है पूरा जहां जलाने को, अपने अंदर की चिंगारी को बुझने मत दो यारो, उम्मीद की
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ज़िंदगी कुछ भी दोहराएगी नहीं
ज़िंदगी कुछ भी दोहराएगी नहीं, जो हाथ से फिसल गया, वो आएगा नहीं। जो आज थक कर बैठ गए राह में, कल मंज़िल भी उनका इंतज़ार करेगी नहीं। हर दि�
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हो गयी शाम
हो गयी है शाम अब तो आरे पिया आके महफ़िल की शम्मां जला जा फिर जलाकर शमां को न जारे पिया हो गयी है शाम अब तो आरे पिया । काटने से भी राते ये
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समय सौदागर
समय, समय आने पर, सबकी गहराई नाप लेता है। समझ नहीं पाता कोई, समय जब चाप लेता है। समय सबका हिसाब, अपने आप लेता है। अर्श गिरे फ़र्श, समय �
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ख्वाब के पार : हक़ीक़त भाग – 2
ख्वाब के पार : हक़ीक़त (भाग – 2) सूर्य अस्ताचल की ओर झुक रहा था। शाम की हल्की ठंडक के बीच, आदि पार्क की एक बेंच पर अपने दोस्त उदय के साथ ब�
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धोरां आळो देश आपणो
धोरां आळो देश आपणो" मोटो खाणो मोटो लाणो, मोटो है प्रदेश आपणो। भाईचारो भैळपणै रो, देखण जोगो मेळ आपणो। मारवाड़ री मारदड़ी रो, मगरतोड़ �
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व्यंगात्मक लेख
बंशीधर की समाज सेवा समाज कभी-कभी लोगों को बहुत देर से याद आता है। कई लोगों के जीवन में वह तब याद आता है जब वह कुर्सी से उतर जाता है यानि
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महत्वाकांक्षाएं।
महत्वाकांक्षाएं । प्रातःकाल धुएं के समान मेरे पास के वातावरण में छाई हुई है हल्की सी ओश , ये ओश की बूंदे मोतियों के समान बिखरी हुई है �
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स्वप्न में
स्वप्न में तुम्हें आकर गुजर जाना था जीने की गुजरती सुधी की तरह मगर तुम बैठ गई वहां जैसे बैठता है चांद निशा की गोद में। स्वप्न में �
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“अभी टूटना मना है”
जब साँसें भी बोझ लगें, और हर कदम सज़ा लगें, तब समझ लेना— तू वहीं खड़ा है जहाँ से इतिहास बनता है। मंज़िल थकती नहीं, थकता सिर्फ़ हौसला ह�
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