Santosh kumar koli ' अकेला' 03 Jan 2026 कविताएँ समाजिक समय का पलड़ा 9580 0 Hindi :: हिंदी
समय, समय आने पर, सबकी गहराई नाप लेता है। समझ नहीं पाता कोई, समय जब चाप लेता है। समय सबका हिसाब, अपने आप लेता है। अर्श गिरे फ़र्श, समय जब अलाप लेता है। दिखा नहीं तल, गिरे मुंँह के बल, कभी लबालब थे जल से। कल तक लहरें नाच रहीं, सुसमय के बल से। कल अब में तबदील हुआ, समय उथल- पुथल से। बच्चे बातें कर रहे, सूखे सपाट थल से। हिमालय का सिर, झुका दिया वक्र वक्त ने। राजतंत्र को राज़ बनाया, समय तख़्त- बख़्त ने। सुरंग सर बिठा लिया, शैल सख़्त ने, रक्त को भुला दिया, स्वार्थी रक्त ने।