काश! समंदर के बीच कहीं खो जाता,
ना किनारे की उम्मीद ना मंजिल की,
बस लहरें जहां ले जाए वही चलता जाता,
आश जैसे खत्म हो गई, वैसी ये घड़ी आई है , read more >>
गहरी अंधेरी रात के बाद, सुहानी भोर आती है
जेष्ठ की तपिश के बाद, घटाएं घनघोर छाती हैं
'यह भी नहीं रहेगा' का भाव, दुःख का दुःख भुलाता है
तू� read more >>
ये बेटियां,
घर की महकती कलियां,
ये ही तो हैं जो खुशी में भी रुला जाती हैं
ये ही तो हैं जो हर गम को भुला जाती हैं
खुद के सपने भी पिता की औ� read more >>