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Ashok Singh

नारी की व्यथा – अशोक सिंह “अलक”

मैं नारी हूं, मैं नारी हूं मैं धरा पर सबसे प्यारी हूं इस मूर्त जगत का सार हूं मैं कँण-कँण का भी उद्धार हूं मै। मैं सृष्टि का उत्थान सदा जन-जन की हूं सम्मान सदा जीवन की अमर कहानी हूं वशुधा की भव्य निशानी हूं ।। हर जन्म है मुझसे जुड़ा हुआ मैं ही इन्सान …

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अदूरदर्शिता – अशोक सिंह

कहाँ है भेद लोगो में ये झूठा दायरा क्या है । नहीं है रक्त मे अंतर फिर मन क्यूँ बावरा सा है ।। है झूठे धर्म के किस्से जाति मे अंधी शक्ले हैं । घृणा है फैली कण-कण में खामोश सबकी अक्लें हैं ।। नहीं लड़ना यहाँ अच्छा इन झूठों के पुलिंदों पर । नही …

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महाकाल – अशोक सिंह

हर वार में, हर सार में हर जीत में, हर हार में हर प्रेम में ,सृंगार में अवतार में , उद्धार में बस एक नाम , ही सदा जीवन के इस अभिसार में । हर कर्म में सत्कर्म में हर हास में परिहास में हर बृद्धि में विकाश में हर साँस में, सन्त्रास में बस …

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मुक्तक – अशोक सिंह

लवों पर सुर्ख नर्मी है, दिलो में प्यार है इतना तुम्हारे दिल मे मेरा दिल, मुझे एतबार है इतना । कहीं ये बात अपनी, बीच में ना बिगड़ जाए मेरे यारा तेरे इन्कार में, इजहार है इतना ।। अशोक सिंह आजमगढ़ उत्तरप्रदेश

” एहसास ” – अशोक सिंह

सभ्य संयमित दामन होगा खुशियों के गुलजार खिलाएंगे अमिट प्यार का ज्वार उठेगा बिछड़े प्यारे मीत मिलेंगे ।। दिल की बातें शब्द बनेगें एहसासों की स्याही में कलम चलेगी यादों की फिर प्रेम के इस परछाई में ।। अधर शिखा के वेदी पर पुष्प खिलाए जायेंगे तेरे बिन कितना तन्हाँ थे यही जताये जायेंगे ।। …

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प्रार्थना – अशोक सिंह

हे इष्ट अलौकिक पारब्रह्म हे खुदा ईश आराध्यदेव बीभत्स विकल है यह समाज अवनि की गरिमा आहत है ना विलग लहू सृष्टि का है फिर इर्ष्या की क्यूं चाहत है ।। अब द्वेश दंभ और अनाचार की प्रतिमाएं उन्मुक्त हुईं आशायें आहत होने लगीं तम घट-घट में है विमुक्त हुईं ।। कुछ करो यहाँ जो …

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“सच्ची श्रद्धांजलि” – अशोक सिंह

हे अमर देश के ज्योतिपुंज हे बलिदानी करुणावतार हे राष्ट्रविंब भारत दर्पण हे भगत बन्धु तुमको प्रणाम ।। ये देश की अपनी गरिमा है जो कण-कण में फैला प्रकाश कुछ राष्ट्र प्रेम में त्याग कियें फ़ासी तक को हो गये तैयार । वो माता थी एक पूज्य बिम्ब जिसने इस वीर को जन्म दिया भारत …

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ऐ खुदा – अशोक सिंह

कैसे लोग हैं इस जमाने में किसी की जिन्दगी बीत जाती है सबको हसाने में और किसी को खुशी मिलती है सबको रुलाने में ।। कोई दूसरों के लिये जान लगा देता कोई लालच में आकर अपनो का ही गला उतार देता ।। कोई दो वक्त की रोटी का मोहताज है कोई पैसों को उड़ाता …

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“व्यंग” – अशोक सिंह

पहले से ही ठानता, रहा बांग्लादेश जीत हमारी हो चली अब काहें का क्लेष।। अब काहें का क्लेष करे अब नागिन डान्स अब हारेगा भारत, करेंगे खूब रोमांस ।। तभी कार्तिक रूप में इनके कक्का आये लै छक्का लै चौक्का, इनका होश उडायें। । अशोक सिंह आजमगढ़

“हिंद बनाम बंग” – अशोक सिंह

हिंद बंग के बीच में हो गया दो -दो हाथ सीना ताने आ गये बड़ी खुशी के साथ।। बड़ी खुशी के साथ जंग में हो गई टक्कर माथे गिरे पसीना फैंस सब पड़ गये चक्कर ।। अब क्या होगा राम बंग ने किया तहलका अपना भारत पड़ गया कैसे इतना हल्का ।। तभी भरी हुंकार …

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माँ – अशोक सिंह

ममता की रसधार है माँ बच्चे का अविरल प्यार है माँ हर कण- कण में हर घट-घट में वसुधा की झंकार है माँ ।। तरु के पल्लव सी जान है माँ दिनकर के दिव्य की मान है माँ दामिनी के दामन का अम्बर अम्बर का एक अरमाँन है माँ ।। ऋषि मुनियों का आधार है …

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सफलता का रहस्य – अशोक सिंह

प्रात की उन्मुक्त किरणें कर धरा को मुग्ध कण में दिव्य ज्योति की तरंगें खिलती वसुधा की उमंगे ।। तम के बादल छट गयें आई सुबह की रुत सुहानी मन के सब निकृष्ट लम्हें मिट गयें आई रवानी ।। हार का वो मर्म अब समूल ही मिटने लगा है अब सफलता का समां लक्ष्य सा …

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