बेरोजगारी पर कब तक लगेगी लगाम-अंकित कुमार दुबे

बेरोजगारी पर कब तक लगेगी लगाम-अंकित कुमार दुबे

आज की लेख जितनी सोचनी है उतनी ही चिंतनीय भी है। शिक्षा के मंदिर से आक्रोश एवं धरना- प्रदर्शन की बातें अब आम हो चुकी हैं। रोजगार मेला में शिक्षित बेरोजगारों की उमड़ती भीड़ समझ में नहीं आता देश में शिक्षा के स्तर को किस रूप में परिभाषित कर रही है। जिस देश के शिक्षक और छात्र एक-दूसरे के खिलाफ सड़कों पर धरना प्रदर्शन करते नजर आए, इस बात से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस देश की शिक्षा व्यवस्था कैसी होगी।

अगर भारत के शिक्षा व्यवस्था की एक-एक कड़ियों को नजदीक से देखना है तो, आपको बहुत ज्यादा गहराई में जाने की कोई जरूरत नहीं है। अक्सर धरना प्रदर्शन की आवाज शिक्षा के गलियारों से ही होते हुए गुजरती है। कभी छात्र, शिक्षक के खिलाफ सड़कों पर उतर आते हैं तो, कभी शिक्षक, छात्र और प्रशासन के खिलाफ इस न्यायालय तो कभी उस न्यायालय का दरवाजा खटखटाते रहते हैं। यू कह ले तो देश में शिक्षा व्यवस्था की हालत इस डगर तो कभी उस डगर जैसी हो गई है। ” लंगड़ी हो रही शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगार हो रहे शिक्षित” यह विषय चिंतन से ज्यादा चिंता का रूप धारण कर चुका है। शिक्षित बेरोजगारों के पास एक से ज्यादा प्रमाणपत्र उपस्थित है रोजगार प्राप्त करने के लिए। लेकिन सारी बातें और सारी काबिलियत तब पलट जाती है, जब वह 45 डिग्री तापमान में भी हुनरबाज हाथ में प्रमाणपत्र लिए रोजगार मेले में धक्का-मुक्की खाते हुए, एक -दूसरे पर गिरते भारातें अपनी काबिलियत साबित करने जाते हैं। नौकरी कब मिलेगी इसका कोई अता-पता नहीं होता। इससे भी ज्यादा अफसोस तब होता है ,जब वह महीनों तक मोबाइल पर टकटकी लगाए 8000 महीने के वेतन की नौकरी का इंतजार करते नजर आते हैं। शिक्षा व्यवस्था की बदहाली बयान करूं या दम तोड़ती काबिलियत का आपसे जिक्र करूं। शिक्षा, शिक्षक और छात्र यह तीनों एक दूसरे को अपनी जरूरत और काबिलियत के बल पर प्रतिपादित करते रहे हैं। परंतु अब यह तीनो ही एक दूसरे के विपरीत नजर आते हैं। इस लेख में आपको शिक्षित बेरोजगारी का आलम तो देखने को मिलेगा ही। साथ ही दिन- प्रतिदिन किस तरह से शिक्षा प्रणाली लंगड़ी होती चली जा रही है ,यह देखने के लिए भी आपको स्पष्ट रुप से मिलेगा।

शिक्षक और छात्र आंदोलन वह भी एक-दूसरे के खिलाफ देश की समस्त व्यवस्था का जीता-जागता बदहाली की तस्वीर प्रकट करती दिख रही है। शिक्षक और छात्र एक दूसर की सार्वभौमिक पहचान होते हैं। लेकिन कहीं ना कहीं यह अपनी सार्वभौमिकता खो बैठे हैं। भारत के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का क्या हाल है ,सोचा शुरुआत यहीं से करते हैं ताकि आपकी आंखों पर से भ्रम की काली पट्टी हट जाए । नई घटना यह है कि मणिपुर विश्वविद्यालय के छात्रों ने वाइस चांसलर के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया है। 40 दिनों से वहां पढ़ाई ठप है । छात्रों के समर्थन में सभी विभागों के अध्यक्षों ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है। यहां तक कि छात्रों ने विश्वविद्यालय के मेन गेट के सामने कुलपति का पुतला बनाकर अंतिम संस्कार तक कर चुके हैं। इतने विकराल रूप के पीछे का वजह यह है कि मणिपुर विश्वविद्यालय में सारे विषय मिलाकर 115 टीचरों की कमी है ,जिसकी वजह से पढ़ाई की व्यवस्था ठप और निचली अवस्था में पहुंच चुकी है। यह हालत सिर्फ मणिपुर विश्वविद्यालय की नहीं , अपितु यही हालत देश की समस्त विश्वविद्यालय एवम कॉलेजों की है , जो अपनी स्थिति को बयां करती है।

क्या आप जानते हैं देश की 80% उच्च शिक्षा कॉलेजों में होती है ,जिसकी हालत बहुत खराब है । 90% उच्च शिक्षा राज्य यूनिवर्सिटी में होती है, जिस की हालत और भी खराब है। इन सब पर क्या ध्यान दिया जा रहा है इसका कोई प्रमाण नहीं है।

इस बात का जिक्र अपने लेख के माध्यम से बस इलिए कर रहा हूं , क्योंकि , 9 जुलाई को मानव संसाधन मंत्री इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेशन की घोषणा की है। प्रकाश जावेडकर ने ट्वीट किया है कि यह मील का पत्थर साबित होने वाला कदम है। उन्होंने ट्वीट इसलिए किया है कि सरकार के एक्सपर्ट के पैनल ने इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंट का चयन कर लिया है । जिसमें 6 विश्वविद्यालय की सूची जारी की गई है। प्रकाश जावेडकर कहते हैं कि इन छ: विश्वविद्यालय की सूची में तीन सरकारी और तीन प्राइवेट कॉलेज है। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे पास 800 यूनिवर्सिटी है लेकिन इनमें से कोई भी दुनिया की टॉप 100 या 200 यूनिवर्सिटी में से एक भी नहीं है। यह बदसूरत नक्शा भारत के शिक्षा प्रणाली की है , जो कई सवालों को कटघरे में खड़ी करती है। आखिर कब तक शिक्षा व्यवस्था के नाम पर खानापूर्ति की गाथा गाई जाएगी।

उधर शिक्षामित्र ना जाने कितने दिनों से दिल्ली की सड़कों पर कब्जा जमाए बैठे हैं , सिर्फ इसलिए कि उनकी नौकरी उनको फिर से मिल जाए , 10 हजार वेतन को 40 हजार तक कर दिया जाए। शिक्षा के गलियारों में दर्द बहुत है , परंतु मरहम के डिब्बे में सिर्फ जुमलेबाजी जैसी नकली दवाएं ही भरी हुई है।

बात अगर हम शिक्षित बेरोजगारी की करें तो सोच भी विराम अवस्था में जाने के लिए मजबूर हो जाती है। जहां के छात्र सिर्फ प्रमाण पत्र पर टॉप श्रेणी में दिखने के लिए नकल जैसे मार्ग पर भी चलने को तैयार हो जाते हैं , वह सही मायने में शिक्षित कैसे हो सकते हैं। नौकरी काबिलियत के बल पर मिलती है, जिसमें देश के ज्यादातर युवा नकल के घर को ही रोशन करने में अपनी काबिलियत साबित कर देते हैं । जिसके चलते पूरी जीवन उनको रोजगार मेंले का चक्कर लगाना पड़ता है।

सब्जी मंडी की तरह देश में जगह-जगह पर रोजगार का कार्यालय तक खुल चुका है , जो देश के लिए सिरदर्द बन चुका है । कई सवालों और सुझाव के साथ लेख का अंत करेंगे। लंगडी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षित बेरोजगारों से जुड़ा अनेकों सवाल जो युवाओं को और इस देश की प्रशासन को अंदर तक झकझोर देगा। विश्वविद्यालय में छात्र संघ का चुनाव आखिर क्यो? क्या आवाज बुलंद करने के लिए छात्र नेता बनना जरूरी है? शिक्षा व्यवस्था के नाम पर आखिर खानापूर्ति कब तक होती रहेगी? शिक्षा की सड़कों पर जुमलेबाजी की आतंक कब छटेगी?

यह सवाल सिर्फ आपका अपने आप से है। क्योंकि बदलना आपको अपने आपको है। आपका जीवन कोई जियो इंस्टीट्यूट की तरह नहीं है ,जिसकी नीव भी नहीं रखी गई और सरकार ने उसे टॉप घोषित कर दिया। इस लेख को बहुत गहराई तक लिखा गया है। परत-दर-परत लेख के माध्यम से हमने आपको समझाने की पूरी कोशिश भी की है।

 

 अंकित कुमार दुबे                                                                                                               Ankit Kumar Dube

  वाराणसी, उत्तर प्रदेश

                                     

 

Ankit Kumar Dubey

मैं अंकित कुमार दुबे वाराणसी उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ | मैं वीर रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में मुख्य सलहाकार के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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