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सच्चे भाई

Prerna sharma 30 Mar 2023 कहानियाँ समाजिक #सच्चे भाई # 45818 1 5 Hindi :: हिंदी

                                                     सच्चे भाई


  सुबह की योगा क्लास लेने के बाद मैं पार्क से होते हुए  बाजार वाली रोड पर सैर के लिए निकल पड़ी ।  सुबह के वक्त हल्की सी ठंडक और शांति वाले माहौल  में सैर करके  तन और मन तरोताजा हो जाता है।  चूं  चूं  करते पक्षियों की चहचहाहट  मधुर संगीत से कम नहीं होती। 
 बड़े  मेट्रो शहर में  शांति वाला माहौल मिल पाना बहुत मुश्किल होता है जहां कुछ पल भीड़भाड़ से अलग खुलकर घुमा फिरा जाए ऐसी कल्पना अगर सच में साबित हो जाए तो दिन की शुरुआत में ही  सोने पे सुहागा वाली बात हो जाती है ।  साफ-सुथरे और एकांत वातावरण में सैर  और व्यायाम करना सेहत के लिए लाभकारी भी रहता है
 मॉर्निंग वॉक कंप्लीट करके मैं अपने घर की तरफ चल पड़ी।  घर पहुंच कर नहा-धोकर ऑफिस के लिए तैयार होकर मैंने अपने लिए  खाने  में सैंडविच बना कर  और खा कर  अपने ऑफिस के लिए निकल गई।
  वैसे तो मैं  लखनऊ निवासी हूं लेकिन मेरी पढ़ाई और नौकरी  मुंबई शहर से ही हुई।  स्कूल और कॉलेज के टाइम पर मैं हॉस्टल में रहा करती थी परंतु नौकरी लगने के बाद मैं पीजी में रहने लगी  मेरे  परिवार में मेरे मां-बाप और मेरी बड़ी बहन है  पिछले साल ही बड़ी बहन की  शादी हो गई है इसलिए अब वहां कोलकाता में रहती है।  मेरी माँ एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल के पद पर है और मेरे पिताजी एक डॉक्टर है। हम दोनों बहनों की परवरिश और शिक्षा बहुत ही बेहतरीन तरीके से हुई है,कभी भी किसी भी चीज की कमी नहीं रही। त्योहारों और जन्मदिन के अवसर पर ही मैं अपने घर  जाती थी तभी पूरा परिवार एक साथ बैठकर बड़े हर्ष और उल्लास के साथ त्योहार को सेलिब्रेट करता था, क्योंकि वही समय था जब पूरा परिवार एक साथ होता था।  हर फंक्शन को सेलिब्रेट करने की प्लानिंग का आईडिया हम पहले से ही सोच कर रखते थे,  लेकिन राखी  का त्यौहार हमारे लिए थोड़ा निराशाजनक रहता क्योंकि हमारा कोई भाई नहीं था और जो चचेरे- ममेरे भाई  है वह पहले से ही विदेश में वेल सेटल्ड है।  आज तक राखी के त्यौहार पर मैं कभी घर नहीं गई वैसे भी राखी की एक  दिन की छुट्टी मिलती है  बस उस  एक  दिन को है  मैं  दिन भर टीवी देख कर ही  व्यतीत करती आई हूं।
 ऑफिस में मैं एक एसआर की पोस्ट पर हूं  और जॉब करते हुए मुझे 3 साल हो गए हैं। सारा दिन ऑफिस के  कामो  में  सुबह से शाम कब हो जाती है इस बात का अनुमान लगाना मुश्किल है।  शाम को ऑफिस से  घर आते वक्त में इस साल की आने वाले  रक्षाबंधन के त्योहार के बारे में सोच रही थी की सोचते-सोचते मैं अपने  फ्लैट  पर पहुंच गई।  हर रोज की तरह हमारे  फ्लैट के  सिक्योरिटी गार्ड  ने मुझसे प्यार से पूछा," दीदी आ गई आप ऑफिस से, दिन ठीक निकला?।  उत्तर में मैं हां जी, हां जी बोल कर  अपने कमरे की तरफ चली गई ।
 अगली सुबह उठकर  प्रतिदिन की तरह  मैं योगा क्लास के बाद सैर को निकल गई  लेकिन  आज  सुबह का माहौल बाकी दिनों  से काफी  अलग  था  आसपास  की  दुकाने और बाजार  आज अपने समय से कुछ पहले ही खुल गई थी दुकानदार अपनी-अपनी दुकानों को रंग-बिरंगी राखियों और झालरों  से सजा रहे  थे।   सैर पर आए कुछ लोग  दुकानों के पास जाकर राखियां देखते और खरीदते  जा रहे थे ।  आज सुबह का दृश्य किसी एग्जिबिशन से कम नहीं लग रहा था। 
 सैर  करके मैं वापस आ रही थी कि हमारी कॉलोनी में अखबार वाला  समय पर सभी के घर के दरवाजे पर अखबार देकर अपनी ड्यूटी पूरी कर रहा था  दूसरी तरफ दूधवाला अपनी साइकिल का होरन मार कर  कॉलोनी के सभी लोगों को दूध लेने के लिए अलर्ट कर रहा था।  मेरे फ्लैट के मेन गेट पर मेरे हिस्से का दूध का पैकेट और अखबार मुझसे पहले पहुंच गया था।
 रोज की तरह मैं नहा धोकर ऑफिस के लिए तैयार होकर फटाफट ब्रेकफास्ट करके ऑफिस के लिए निकल पड़ी,  फ्लैट से होते हुए कॉलोनी और फिर बस में भी मैं  सभी के मुख से  राखी के त्यौहार की बातें ही सुन रही थी। ऑफिस पहुंचते ही  नोटिस बोर्ड पर लगे " रक्षाबंधन  अवसर  पर  ऑफिस में 1 दिन का अवकाश"  देखकर सभी कर्मचारी बहुत खुश थे आखिर हो भी क्यों न,मात्र 1 दिन बाद  ही रक्षाबंधन का त्यौहार आने वाला था। इस बार राखी का त्यौहार रविवार के दिन आने वाला है ऊपर से 1 दिन पहले ऑफिस में  सेकंड सैटरडे  का ऑफ रहता है एक साथ दो छुट्टियों का होना सबके लिए  खुशी की बात थी  उस दिन ऑफिस में किसी का भी मन ऑफिस के काम में ना लगकर  रक्षाबंधन के त्यौहार की बातों पर ही था।  मैं भी बहुत खुश थी परंतु थोड़ी सी उदास भी थी  क्योंकि मेरे पास कोई भाई नहीं था।  मैं अपनी बातों में ही कहीं खुद में गुम हो गई कि  तभी टेबल पर चाय का प्याला रखते हुए संतोष ने बड़ी विनम्रता से मुझे  कहा  "दीदी चाय का वक्त हो गया है चाय पी लो"संतोष हमारे ऑफिस में हेल्पर का काम करता है,जिनका काम सभी को चाय पिलाना और पानी पिलाना है।

 शाम को दफ्तर से आने के बाद मैंने देखा कि मेरे आने से पहले ही माली भैया ने गमलों में पौधों की अच्छे से काट कटाई कर दी हैं और प्रेस वाले ने  मेरे द्वारा दिए गए कपड़ो को प्रेस करके अच्छे से तेय  लगाकर मेरे कमरे के दरवाजे के बाहर रख दिया हैं।  मैंने जल्दी से अपने सारे सामानों को समेटा और रात्रि के भोजन की तैयारी करने  लगी। 
 अगले दिन सुबह उठकर  मैं हर दिन की तरह योगा करने के बाद सैर करने चली गई  क्योंकि शनिवार और रविवार का  अवकाश होने की वजह से रिलीफ महसूस कर रही थी और मैंने सैर करने को भी एक्स्ट्रा टाइम दिया।  आज तो सभी दुकानें सज धज कर तैयार थी और हलवाई की दुकान से  मिठाई की खुशबू दूर-दूर तक आने जाने वालों को रक्षाबंधन के त्यौहार का  संदेश देती जा  रही थी।  पूरा बाजार सूरज की रोशनी में  चम चम चमक रहा था।  सुबह-सुबह ही मानो सैर करने के   बजाय किसी मेले में घूम रहे हो । घर आकर मैं नहा धोकर तैयार हो गई  और  ब्रेकफास्ट करते  वक्त सोचने लगी कि 2 दिन की छुट्टी को कैसे इंजॉय किया जाए!
 तभी दरवाजे की घंटी बजी  मैं उठकर दरवाजा खोलने को गई,  दरवाजा खोलते ही देखा कि अखबार और दूध का पैकेट पहले से ही रखकर दूधवाले  और अखबार वाले भैया ने अपनी ड्यूटी को पूरा कर दिया है। मैं उन दोनों से कुछ कह पाती उतनी देर में वहां दोनों कॉलोनी से बाहर अपनी साइकिल पर सवार होकर निकल चुके थे।
 वापस कमरे में आकर मैं सोच में पड़ गई  कि  यह सब्जी वाले, दूध वाले, कपड़ो को प्रेस करने वाले,  रात भर कॉलोनी की चौकीदारी करने वाले, अखबार वाले भैया,  हमारी उपस्थिति और अनुपस्थिति में हमारे काम को हम से पहले कर देते हैं चाहे उसके लिए हमको  उन्हें पैसे देने पड़ते हैं लेकिन एक इंसानियत का भाव उन पर झलकता है।
          रात को हम सबका अपने अपने घरों में बेफिक्री से सो जाना क्योंकि हमें पता है चौकीदार भैया कलौनी मैं किसी चोर डकैत को आने नहीं देंगे या हमें कुछ  गलत होने पर अलर्ट कर देंगे।  
                 ऑफिस जाने  से लेकर ऑफिस से आने तक मेरे घर की रखवाली करने वाले  चौकीदार भैया जिन पर भरोसा करके  अपनी जॉब पर चली जाती हूँ  क्योंकि मुझे पता है कि मेरी जाने के बाद यह फ्लैट के आसपास किसी को भटकने नही देंगे।
          सुबह मेरे  सैर  करके आने से पहले दूध वाले भैया जो दूध का पैकेट मेरे दरवाजे पर रख देते हैं उनकी इसी आदत की वजह से मैं सुबह की चाय का आनंद ले  पाती हूं।
 समय पर अखबार देकर जाने वाले भैया जिनकी वजह से मैं  देश और विदेश की खबरों को समय पर पढ़ पाती हूँ । 
 वही  प्रेस वाले भैया जिनकी वजह से मैं ऑफिस के कपड़ो को प्रेस करने से  निश्चिंत रहती हूं।
 सबसे बड़े  हमारे फौजी भाई लोग जिनकी वजह से हम अपने देश, शहर और कस्बों में बढ़ते आतंकी  हालत में भी  सुरक्षित महसूस करते हैं।
क्या यह हमारे भाई नहीं?  क्या मैं इन सभी को अपना भाई नहीं मान सकती? 
 वैसे भी तो मैं इन्हें भैया कहकर बुलाती हूं! 
वो ऑफिस में संतोष  भैया  जो समय-समय पर हमें पानी और चाय देता है और दीदी शब्द से मुझे संबोधित करता है, क्या  वह मेरा भाई नहीं?
 क्या असल मायनों मे रक्षाबंधन का त्यौहार अपने सगे और खून के रिश्ते से बने भाई के साथ ही मनाया जाता है? 
 इतने सारे  प्रश्न मेरे दिमाग में घूम रहे थे और खुद  ही खुद  सुलझने  की कोशिश कर रहे थे। असल मायनो में रक्षाबंधन का 
त्यौहार  दो लोगों के बीच एक अटूट प्रेम, विश्वास, और एक रक्षा कवच की डोर का संदेश है। रक्षाबंधन  दो लोगों के बीच  एक ऐसा रिश्ता कायम रखता है  जो किसी अपने के होने का एहसास दिलाता है और हमें यकीन होता है की हमारे मुसीबत पड़ने पर हमारी रक्षा के लिए केवल वही इंसान हमारा  साथ दे सकता है। इसमे  किसी एक ही जाति और धर्म का होना अनिवार्य नहीं,   इसमें कोई रंगभेद का फर्क नहीं बल्कि यह त्यौहार एक स्नेहे और उम्मीद का प्रतीक है।
  जरूरी नहीं, एक बहन अपने भाई पर ही राखी  बंधे; 
 एक भक्त अपने भगवान को भी राखी बांध सकता है
एक भाई अपने  दूसरे भाई को भी राखी बांध सकता है
 एक मित्र अपने सच्चे मित्र को राखी बांध सकता है  
एक बहन अपनी बड़ी बहन को भी राखी बांध सकती हैं 
 क्योंकि जो लोग  हमें बुराइयों  से बचाकर सही मार्ग का रास्ता दिखाते हैं, जो हमारी छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करते हैं,  जिनकी नोकझोंक में एक अपना पन सा लगता है, जो बिना किसी स्वार्थ के  हमारे लिए  अपने  कर्तव्यों का पालन करते हैं  जो आपके कुछ कहने से पहले ही आपकी बातों को समझ जाते हैं,  जिनके साथ रहकर आप तन मन से खुद को सुरक्षित समझते हैं,  जिनके लिए हर साल राखी के दिन पर रेशम की डोर तैयार करते हैं और जिनके लिए हमेशा राखी के त्योहार का इंतजार करते है  वही सच्चे भाई  कहलाते हैं ।
 अपने इन्हीं बातों को विराम देकर, मैं फटाफट बाजार जाने के लिए तैयार हुई  और  अपने हर भाई के लिए  सुंदर सुंदर राखियां  और  ढेर सारी मिठाई  खरीद कर लाई ।  घर आकर बाजार  से खरीदी राखियों को मैं बार-बार देख रही थी और सुबह होने का इंतजार कर रही थी । 
सुबह होते ही मैंने योगा क्लास और सैर पर ना  जाने  का प्लान बनाया, सुबह जल्दी  उठ कर घर की सफाई करके नहा धोकर, घर के छोटे से मंदिर में पूजा करके अपने मम्मी पापा और बहन को फोन पर ही रक्षाबंधन के त्यौहार की बधाई दी ।
 इतनी खुशी के मौके पर मैं सज धज कर तैयार हुई और शगुन की थाली को सुंदर-सुंदर राखियो, जलते हुए दिए, मिठाई और  छोटी सी डिब्बी में लाल रंग की सिंदूर के साथ तैयार किया।  हमारे फ्लैट में एक बड़ा हॉल रूम भी हैं  जहां अक्सर पार्टी और त्योहारों पर बड़ी पूजा और फंक्शन हुआ करता हैं  मैंने भी इस बार उस हॉल को बहुत ही ज्यादा खूबसूरती तरीके से  रक्षाबंधन के फंक्शन के अवसर पर सजाया। 
 कॉलोनी मे रह रही और भी लड़कियों ने मुझसे इस फंक्शन का कारण पूछा  मैंने अपने विचार को उनके साथ सांझा किया। वे  सभी  मेरी बातों से काफी प्रभावित हुई।  अब मैं अकेली नहीं थी, मेरे साथ बाकी लड़कियां भी उनको भाई समझ कर राखी बांधना चाहती थी, फिर क्या था एक छोटी सी खुशी और उम्मीद पर चार चांद लग गए  ।
 आज अपने भाइयों(अखबार वाले, दूध वाले, सब्जी वाले, प्रेस वाले, चौकीदार भैया ) के आने से पहले ही मैं और बाकि  लड़कियां भी  मुख्य द्वार पर खड़ी होकर उनका इंतजार करने लगे। एक-एक कर उन सभी  के आने  पर फूलों के साथ उनका स्वागत किया,  हमारा यह सब करना उनके लिए सरप्राइज जैसा ही था।  हमारे द्वारा दिए गए इस आदर और सम्मान को पाकर वे  सभी बहुत खुश हुए ।
 थोड़ी देर उनसे बातों का सिलसिला जारी रहा और हंसी मजाक के ठहको  के बाद  हमने अपनी रक्षाबंधन के त्यौहार का  शुभआरंभ किया। मैं अभी भी एक और भाई का इंतजार कर रही थी  तभी देरी से आते हुए गोलगप्पे वाले  भैया  को  मैंने देर  से आने पर  थोड़ी नाराजगी दिखाई  फिर उनका स्वागत करके एक एक कर उन सभी की  कलाइयों पर राखी बांधकर  एक नए रिश्ते को कायम किया और सच्ची ईमानदारी के साथ इस रिश्ते  को निभाने का प्रण लिया। आज मैं बहुत खुश थी और अपनी नजरों  में ही इतराती हुई  घूम रही थी।

तो आइए इस रक्षाबंधन  एक रेशम की डोर के साथ इन सभी भाई लोगों को आदर और सम्मान देने की प्रतिज्ञा ले।
                                  और 
इस रक्षा बंधन  प्रत्येक भाई  हर लड़की को अपनी बहन के रूप में देख कर उनके  साथ हो रहे दुष्कर्म और अत्याचार को रोकने की शपथ ले  क्योंकि देश की हर लड़की अगर आपकी बहन नहीं तो वहां किसी ना किसी की बहन जरूर होगी इसी बात को अहमियत देकर,  इंसानियत की  चादर  पहनकर  देश और समाज में  हर लड़की के लिए राक्षस नहीं रक्षक का कवच बने ।
   लेखिका प्रेरणा शर्मा







       











 

Comments & Reviews

संदीप कुमार सिंह
संदीप कुमार सिंह बहुत सुन्दर

11 months ago

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