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दो तरह के लोग

डॉ राजेंद्र यादव आजाद 08 Aug 2026 आलेख राजनितिक आलेख 567 0 Hindi :: हिंदी

एक देश, दो तरह के लोग
कभी-कभी लगता है कि भारत अब  भाषाओं और संस्कृतियों में ही नहीं बँटा, बल्कि  भारतीयों की सोच भी दो वर्गों में विभाजित हो गयी है जिनके बीच संवाद का पुल दिन-ब-दिन टूटता जा रहा है। एक तरफ वे लोग हैं जिनकी सुबह अखबार में रोजगार के विज्ञापन ढूँढ़ते हुए होती है और रात बच्चों की फीस, घर की रसोई और भविष्य की चिंता करते-करते बीत जाती है। उन्हें महँगाई दिखाई देती है, भ्रष्टाचार दिखाई देता है, अस्पतालों की बदहाली दिखाई देती है, शिक्षा की गिरती गुणवत्ता दिखाई देती है और किसानों की बेचैनी भी। वे चाहते हैं कि देश में इन मुद्दों पर चर्चा हो, क्योंकि इन्हीं से आम आदमी का जीवन बनता और बिगड़ता है।
दूसरी तरफ एक ऐसा वर्ग भी दिखाई देता है, जिसकी राजनीति का केंद्र मुद्दे नहीं,  एक पार्टी विशेष  के चेहरे हैं। उसके लिए हर प्रश्न का उत्तर  नेता की प्रशंसा में और हर असहमति का उत्तर किसी विरोधी पर कटाक्ष में छिपा है। वह यह भूल जाता है कि लोकतंत्र में सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी होती हैं और नागरिकों का प्रश्न पूछना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
विडंबना देखिए, देश में बेरोजगार युवा नौकरी की बात करे तो उसे राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है। किसान अपनी फसल का उचित मूल्य माँगे तो उसकी नीयत पर सवाल उठते हैं। छात्र परीक्षा व्यवस्था पर प्रश्न करे तो उसके पीछे षड्यंत्र खोजा जाता है। मानो नागरिक का पहला कर्तव्य समस्याएँ बताना नहीं, बल्कि उन्हें भूल जाना हो।
इधर कुछ समय से  लोकतांत्रिक   आंदोलन से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन यह अधिकार लोकतंत्र देता है कि नागरिक अपनी आवाज़ उठाएँ। समस्या तब पैदा होती है जब आंदोलन की भाषा और उसके जवाब की भाषा दोनों ही संयम खोने लगती हैं।
आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को मंच दे दिया है, लेकिन मंच के साथ मर्यादा नहीं दी। परिणाम यह हुआ कि तर्क धीरे-धीरे गायब होने लगे और उनकी जगह नारे, कटाक्ष और अपमान ने ले ली। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि कई बार संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों ने भी अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया और उनके  लिए भी अशोभनीय भाषा का प्रयोग होने लगा जो  उचित नहीं है। किसी भी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री या जनप्रतिनिधि की नीतियों की कठोर आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन व्यक्तिगत गाली-गलौज लोकतांत्रिक संस्कृति को समृद्ध नहीं करती, उसे कमजोर करती है!  आत्ममंथन का प्रश्न यहीं   है कि आज भाषा क्यों बिगड़ रही है। प्रश्न यह भी है कि वर्षों से सार्वजनिक जीवन में जिस प्रकार व्यक्तिगत कटाक्ष, अपमानजनक संबोधन और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा है, क्या उसने समाज को भी उसी दिशा में नहीं धकेला? जब सार्वजनिक विमर्श का स्तर गिरता है तो उसका प्रभाव संसद तक सीमित नहीं रहता; वह चाय की दुकान, कॉलेज, मोहल्ले, परिवार और  बच्चों की भाषा तक पहुँच जाता है।
इसलिए आवश्यकता दोषारोपण की नहीं, आत्मचिंतन की है। यदि सत्ता पक्ष प्रशंसा सुनना चाहे और विपक्ष  विरोध करना अपना धर्म समझे, यदि समर्थक हर आलोचक को शत्रु मान लें और आलोचक हर समर्थक को अंधभक्त घोषित कर दें, तो लोकतंत्र बहस का मंच नहीं, शोर  शराबे का अखाड़ा बन जाता है।
देश को आज जयकारों से अधिक जवाबों की आवश्यकता है। उसे ऐसे नागरिक चाहिए जो प्रश्न पूछने का साहस रखें और ऐसे शासक जो उन प्रश्नों का उत्तर देने का धैर्य रखें। क्योंकि लोकतंत्र में ताली से सरकारें लोकप्रिय हो सकती हैं, लेकिन प्रश्नों से शासन बेहतर बनता है! 
लोकतंत्र बड़ा अजीब जीव है। इसे न तो हर समय तालियाँ चाहिए और न हर समय गालियाँ। इसे  इतना चाहिए कि नागरिक जागते रहें और शासक जवाब देते रहें। लेकिन हमने लोकतंत्र को भी दो हिस्सों में बाँट दिया है। एक हिस्सा मान बैठा है कि सरकार से प्रश्न पूछना ही राष्ट्रभक्ति है, तो दूसरा हिस्सा यह मान बैठा है कि सरकार से प्रश्न पूछना ही राष्ट्रद्रोह है। दोनों ही अतियाँ हैं और दोनों ही लोकतंत्र के लिए उतनी ही खतरनाक हैं।
आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को पत्रकार बना दिया है, हर मोबाइल को टीवी चैनल और हर व्हाट्सऐप ग्रुप को संसद। फर्क सिर्फ इतना है कि संसद में कभी-कभी नियम याद आ जाते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर नियमों की जगह ट्रोल सेना तैनात रहती है। वहाँ तर्क नहीं चलते, ट्रेंड चलता हैं। तथ्य नहीं चलते, फ़ॉरवर्ड चलता हैं। विचार नहीं चलते, आईटी सेल और ट्रोल संस्कृति चलती है। किसी ने बेरोजगारी पर प्रश्न पूछा नहीं कि उसके पुरखों का इतिहास खोज लिया जाता है। किसी ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया नहीं कि उसकी देशभक्ति का प्रमाणपत्र माँग लिया जाता है। किसी ने महँगाई पर चिंता जताई नहीं कि उसे किसी दल का एजेंट घोषित कर दिया जाता है।
सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि अब मुद्दों पर बहस नहीं होती!  रोजगार की चर्चा पाँच मिनट चलती है, उसके बाद चर्चा इस बात पर होने लगती है कि प्रश्न पूछने वाला किस विचारधारा का है। किसान की फसल पीछे छूट जाती है और किसान की जाति आगे आ जाती है। छात्र की डिग्री गायब हो जाती है और उसकी राजनीतिक पसंद सुर्खियों में आ जाती है। अस्पताल में दवा नहीं है, लेकिन टीवी स्टूडियो में बहस पूरी तैयारी से मौजूद है। स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर राष्ट्रभक्ति के प्रमाणपत्र बाँटने वालों की कोई कमी नहीं।
जेन जी समाज के हालिया आंदोलन ने भी एक बार फिर यह याद दिलाया कि लोकतंत्र में हर समाज को अपनी बात कहने का अधिकार है। किसी आंदोलन से असहमति हो सकती है, उसके तरीकों पर बहस हो सकती है, लेकिन नागरिकों की आवाज़ को सुनना लोकतंत्र का दायित्व है। उतना ही आवश्यक यह भी है कि आंदोलन करने वाले और उनका विरोध करने वाले—दोनों अपनी भाषा की मर्यादा बनाए रखें। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, अपमान उसकी कमजोरी।
आज चिंता इस बात की भी है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा का स्तर लगातार गिरा है। राजनीतिक मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक, कटाक्ष की जगह कटुता ने ले ली है। व्यंग्य की जगह व्यक्तिगत हमलों ने और आलोचना की जगह अपमान ने। यह किसी एक दल, एक विचारधारा या एक समूह की समस्या नहीं है; यह पूरे सार्वजनिक विमर्श का संकट है। जब नेता एक-दूसरे के लिए संयमित भाषा छोड़ देते हैं, तब समर्थकों से संयम की अपेक्षा करना कठिन हो जाता है और जंतर मंतर पर जेन  जी युवा अक्सर वही बोलते  देखा है जो वह अपने प्रभावशाली चेहरों से सुनता आया है।
विडंबना यह है कि जो लोग संविधान की शपथ लेकर सार्वजनिक जीवन में आते हैं, उनके समर्थक कभी-कभी संविधान की आत्मा—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण संवाद—को ही भूल जाते हैं। परिणाम यह होता है कि हर असहमति युद्ध बन जाती है और हर आलोचना निजी दुश्मनी।
देश को आज ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है जो न अंधभक्ति करें और न अंधविरोध। जो सत्ता से प्रश्न भी पूछें और विपक्ष से भी जवाब माँगें। जो यह समझें कि सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन लोकतंत्र तब तक जीवित रहता है जब तक नागरिक विवेक से सोचते हैं। राष्ट्र किसी व्यक्ति का पर्याय नहीं है। सरकार का सम्मान आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है संविधान का सम्मान, नागरिक का सम्मान और संवाद की मर्यादा।
शायद अब समय आ गया है कि हम यह तय करें—हम अपने बच्चों को क्या विरासत देना चाहते हैं? तर्क की या तकरार की? संवाद की या शोर की? प्रश्न पूछने का साहस या प्रश्न पूछने वालों से घृणा? क्योंकि आने वाली पीढ़ियाँ हमारे भाषण नहीं, हमारा व्यवहार सीखेंगी। यदि हम उन्हें  नारे देंगे तो वे नारे दोहराएँगे; यदि हम उन्हें तर्क देंगे तो वे भविष्य बनाएँगे।
कभी-कभी मन में प्रश्न उठता है कि आखिर इस देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है? बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की बदहाली या फिर हमारी वह आदत, जिसमें हम हर समस्या पर बहस करने के बजाय पहले यह तय करते हैं कि समस्या बताने वाला किस दल, किस जाति, किस धर्म और किस विचारधारा का है। 
देश का दुर्भाग्य यह नहीं है कि यहाँ समस्याएँ हैं। समस्याएँ तो दुनिया के हर देश में होती हैं। दुर्भाग्य यह है कि यहाँ समस्याओं पर चर्चा करने वाले ही समस्या घोषित कर दिए जाते हैं। जो बेरोजगारी की बात करे, उससे पूछा जाता है कि वह किसके इशारे पर बोल रहा है। जो भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए, उसे सलाह दी जाती है कि पहले दूसरे राज्यों का भ्रष्टाचार देखो। जो महँगाई की चर्चा करे, उसे इतिहास का पाठ पढ़ाया जाता है। यानी वर्तमान का हर प्रश्न अतीत की काल कोठडी में भेज दिया जाता है।
 जिस लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत सवाल पूछना थी, उसी लोकतंत्र में अब सबसे बड़ा अपराध सवाल पूछना बनता जा रहा है। मानो नागरिक का कर्तव्य  मतदान करना रह गया हो और उसके बाद पाँच वर्षों तक मौन साध लेना। यदि ऐसा ही लोकतंत्र चाहिए तो संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रावधान खत्म कर देना चाहिए ?
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना देश की आलोचना नहीं है। उसी प्रकार सरकार का समर्थन करना भी अपराध नहीं है। अपराध तब शुरू होता है जब समर्थन विवेक छोड़ कर  अपनी मर्यादा भूला देता है। अंधभक्ति और अंधविरोध दोनों लोकतंत्र के दो ऐसे पहिए हैं जो गाड़ी को आगे नहीं बढाते ,  बल्कि खाई की ओर ले जाते हैं।
आज सबसे अधिक चिंता उस पीढ़ी की है जो राजनीति को विचारों से नहीं, हैशटैग से सीख रही है। जिसे लगता है कि दस सेकंड का वीडियो ही पूरा सच है और सौ शब्दों की गाली किसी तर्क से अधिक प्रभावशाली है। यह तकनीक की समस्या नहीं, समाज की भी समस्या है। बच्चे वही सीखते हैं जो बड़े उन्हें सिखाते हैं। यदि सार्वजनिक जीवन में शालीनता समाप्त होगी, तो समाज में भी शालीनता टिक नहीं पाएगी।
हम भूलते जा रहे हैं कि सत्ता कभी स्थायी नहीं होती। इतिहास की सबसे शक्तिशाली कुर्सियाँ भी समय के सामने टिक नहीं सकीं। लेकिन जनता हमेशा रही है, संविधान हमेशा रहा है और लोकतंत्र हमेशा रहेगा। इसलिए किसी भी सरकार से बड़ा देश है, किसी भी नेता से बड़ा संविधान है और किसी भी दल से बड़ा नागरिक है।
देश को ऐसे लोगों की आवश्यकता नहीं जो हर सुबह यह तय करें कि आज किसकी जय-जयकार करनी है और किसे गाली देनी है। देश को ऐसे नागरिक चाहिए जो यह पूछें कि कितने युवाओं को रोजगार मिला, कितने स्कूलों में शिक्षक पहुँचे, कितने अस्पतालों में दवाइयाँ उपलब्ध हैं, किसानों की आय कितनी बढ़ी, भ्रष्टाचार कितना घटा और न्याय आम आदमी तक कितनी तेजी से पहुँचा। यही प्रश्न लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।
राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं कि हम किसी नेता का नाम कितनी ऊँची आवाज़ में लेते हैं; सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि हम अपने देश के नागरिकों के दुख को कितनी ईमानदारी से महसूस करते हैं। भूखे पेट को नारा नहीं, रोटी चाहिए। बेरोजगार हाथों को भाषण नहीं, काम चाहिए। बीमार को बहस नहीं, इलाज चाहिए। छात्र को ट्रोल नहीं, शिक्षा चाहिए। किसान को आश्वासन नहीं, सम्मानजनक आय चाहिए। यही राष्ट्रनिर्माण का रास्ता है।
शायद अब समय आ गया है कि हम दो तरह के लोगों में बँटे रहने के बजाय तीसरी श्रेणी का निर्माण करें—उन लोगों की, जो न सत्ता के अंध समर्थक हों, न अंध विरोधी; जो तर्क को नारे से ऊपर रखें, संविधान को व्यक्ति से ऊपर रखें और देश को दल से ऊपर रखें क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी विजय चुनाव नहीं, जागरूक नागरिक होता है।
और अंत में इतना ही—देश को तालियाँ बजाने वाले हाथों की आवश्यकता है, लेकिन उससे कहीं अधिक उन हाथों की आवश्यकता है जो ईमानदारी से काम करें; देश को नारे लगाने वाले कंठों की आवश्यकता है, लेकिन उससे कहीं अधिक  नेहा बोरा जैसी उन आवाज़ों की आवश्यकता है जो सच बोलने का साहस रखें; और देश को ऐसे नेताओं की आवश्यकता है जो प्रश्न सुनकर बोखलाये नहीं बल्कि उनका शालीनता से उत्तर दें!  ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है जो किसी भी सत्ता से यह कह सकें—हम आपका सम्मान करते हैं, लेकिन प्रश्न पूछना नहीं छोड़ेंगे; क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा देशभक्त वही है जो अपने देश को बेहतर बनाने के लिए बोलने का साहस रखता है। डॉ राजेंद्र यादव आजाद मोबाइल 94 1427 1288

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