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कृष्ण कौन

डॉ राजेंद्र यादव आजाद 05 Sep 2026 आलेख धार्मिक कृष्ण कौन 50 0 Hindi :: हिंदी

कृष्ण कौनथे? 
महाभारत का कुरुक्षेत्र हजारों वर्ष पहले समाप्त हो गया, लेकिन लगता है कि कृष्ण को लेकर एक नया कुरुक्षेत्र आज सोशल मीडिया पर खड़ा हो गया है। कोई कृष्ण को यादव अहीर, कोई गुर्जर, कोई जाट और कोई उन्हें राजपूत सिद्ध करने में लगा है। हर किसी के पास अपनी परंपरा, अपनी मान्यता और अपने तर्क हैं। स्थिति कभी-कभी ऐसी दिखाई देती है जैसे कृष्ण कोई जाति प्रमाणपत्र लेकर पैदा हुए थे और आज अलग-अलग जातियां उस प्रमाणपत्र पर अपना दावा ठोक रही हैं। लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कृष्ण कौन  थे, हर किसी को कृष्ण को अपनी जाति का साबित करने की इतनी बेचैनी आखिर क्यों है? क्या किसी महापुरुष की महानता उसके जन्म से तय होती है या उसके कर्म से? क्या कृष्ण की महानता इसलिए है कि उन्हें हम अपनी जाति का मानते हैं, या इसलिए कि उनका व्यक्तित्व जाति की सीमाओं से कहीं बड़ा है?
हजारों वर्ष पुराने समाज की सामाजिक संरचनाओं को आज की जातियों के खांचों में हूबहू रख देना इतिहास का सरल समाधान नहीं है। कृष्ण की सामाजिक और ऐतिहासिक पहचान को लेकर भारतीय परंपराओं में अनेक स्तरों पर चर्चा मिलती है और आधुनिक जातीय पहचानें उसी रूप में प्राचीन समाज पर लागू कर देना ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है। इसलिए किसी एक आधुनिक जाति के पक्ष में अंतिम फैसला सुनाने के बजाय इस विषय को इतिहास, परंपरा और प्रमाण के आधार पर समझना चाहिए। लेकिन एक बात इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है—कृष्ण को किसी एक जाति की जागीर बना देना स्वयं कृष्ण के विराट व्यक्तित्व को छोटा करना है।
मैं यादव, अहीर, जाट और गुर्जर सहित उन सभी किसान और पशुपालक परंपराओं को एक साझा सामाजिक धारा के रूप में देखता हूं, जिनके जीवन में खेती, पशुपालन, श्रम, स्वाभिमान और कर्म की केंद्रीय भूमिका रही है। मेरे अनुसार इन समुदायों के बीच कृष्ण को लेकर कोई छीना-झपटी नहीं होनी चाहिए। कृष्ण इन सबकी सांस्कृतिक स्मृति और लोकजीवन में अलग-अलग रूपों में उपस्थित हो सकते हैं। इन समुदायों की जीवन-पद्धति में जो श्रम, साहस, खेती, पशुपालन और कर्मप्रधानता दिखाई देती है, उसमें कृष्ण की उस छवि से एक गहरा सांस्कृतिक साम्य दिखाई देता है जिसे भारतीय परंपरा ने सदियों से अपने भीतर संजोया है। इसलिए कृष्ण को लेकर यादव अहीर को गुर्जर से, गुर्जर को जाट से और जाट को यादव से लड़ाने के बजाय यह समझना अधिक जरूरी है कि इन सभी के बीच साझा श्रम और किसान-पशुपालक संस्कृति की कितनी गहरी कड़ियां रही हैं।
कृष्ण की पहचान को  जन्म के प्रश्न में बंद कर देना उनके कर्म और दर्शन के साथ अन्याय होगा। कृष्ण में एक ऐसा व्यक्तित्व दिखाई देता है जो परिस्थितियों के सामने झुकता नहीं, अन्याय को स्वीकार नहीं करता, शांति का रास्ता तलाशता है और जब संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है तो उससे पीछे भी नहीं हटता। वे  बांसुरी बजाने वाले कृष्ण नहीं हैं,  माखन चुराने वाले बालक नहीं हैं और न ही  रासलीला के पात्र हैं। उनके व्यक्तित्व में राजनीति है, कूटनीति है, मित्रता है, नेतृत्व है, रणनीति है, करुणा है, साहस है और सबसे बढ़कर परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने का क्षमता है। जब कृष्ण और अहीर की बात आती है तो ‘ग्वाला’ शब्द को अपमान बनाने की कोशिश पर भी सवाल उठना चाहिए। आखिर ग्वाला होना शर्म की बात कब से हो गया? दूध बेचना अपराध कब हो गया? गाय-भैंस पालना, पशुओं की देखभाल करना, खेत में मेहनत करना और अपने श्रम से परिवार चलाना छोटा काम कब हो गया? यदि किसी व्यक्ति ने सुबह उठकर पशुओं को चारा दिया, दूध निकाला, उसे बाजार तक पहुंचाया और उसी मेहनत से अपने बच्चों की पढ़ाई और परिवार की रोटी का इंतजाम किया तो उससे बड़ा श्रमशील और स्वाभिमानी कौन हो सकता है? 
‘ग्वाला’ को गाली बनाना वास्तव में  यादव या अहीर का अपमान नहीं है, यह श्रम का अपमान है। जिस समाज को सुबह चाय में दूध चाहिए, बच्चों को दूध चाहिए, मिठाई में दूध चाहिए और बाजार में दूध से बने अनगिनत उत्पाद चाहिए, वही समाज अगर दूध बेचने वाले को नीचा समझे तो इससे बड़ी सामाजिक विडंबना क्या होगी? जिस हाथ ने दूध पहुंचाया, उसी हाथ को छोटा समझने वाली मानसिकता को अपने भीतर झांकना चाहिए।
इसलिए यदि कोई यादव  अहीर अपने आपको कृष्ण से जोड़ता है और ग्वाला कहता है तो उसे शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं, बल्कि गर्व से कहना चाहिए—हां, हमारे पुरखों ने पशु पाले, दूध बेचा, मेहनत की और अपने श्रम से समाज का पेट भरा। यही हमारी परंपरा है और यही हमारा स्वाभिमान है। श्रम से कमाई गई रोटी कभी छोटी नहीं होती। खेत में पसीना बहाने वाला किसान, पशु पालने वाला पशुपालक, दूध बेचने वाला व्यक्ति, कारीगर, मजदूर और अपने हाथों से जीवन बनाने वाला हर मनुष्य सम्मान का अधिकारी है।
इसी संदर्भ में यादव अहीर, जाट और गुर्जर जैसी किसान-पशुपालक परंपराओं को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने के बजाय उनके साझा श्रम और जीवन-संस्कारों को समझना चाहिए। इन समुदायों में ऐतिहासिक रूप से अलग-अलग क्षेत्रीय, सामाजिक और राजनीतिक धारा रही हैं; उन्हें पूरी तरह एक ही ऐतिहासिक जाति कहना भी उचित नहीं होगा। लेकिन किसान और पशुपालक जीवन, श्रम की प्रतिष्ठा, स्वाभिमान और कर्मप्रधान सोच जैसी साझा विशेषताएं इन्हें एक व्यापक सांस्कृतिक धरातल पर संवाद करने का अवसर देती हैं। यही वह धरातल है जहां कृष्ण को बांटने के बजाय उन्हें साझी प्रेरणा बनाया जा सकता है।
कृष्ण को लेकर मेरा आग्रह इसलिए भी स्पष्ट है कि मैं यादव अहीर, जाट और गुर्जर सहित किसान समुदायों को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि श्रम और स्वाभिमान की साझी परंपराओं से जुड़े समाज के रूप में देखता हूं। यदि इन सभी समुदायों के लोकजीवन में कृष्ण के प्रति गहरी आस्था है तो इसे संघर्ष का कारण क्यों बनाया जाए? कोई कृष्ण को अपने पुरखों की स्मृति से जोड़ता है, कोई अपनी लोकपरंपरा से, कोई अपने आराध्य के रूप में और कोई कर्मयोग के प्रतीक के रूप में—इन सभी भावनाओं के लिए जगह होनी चाहिए।
कृष्ण का सबसे बड़ी संदेश यही है कि मनुष्य को उसके कर्म से पहचानिए। भगवद्गीता के संवाद में कर्म, कर्तव्य, विवेक और मोह से ऊपर उठने की बात आती है। अर्जुन के सामने संकट  युद्ध का नहीं था; संकट यह था कि वह अपने कर्तव्य और व्यक्तिगत मोह के बीच कैसे निर्णय करे। कृष्ण उसके सारथी बने, उसके भीतर के भ्रम से संवाद किया और उसे निर्णय की ओर ले गए। यही कृष्ण का विराट रूप है—वे  रथ नहीं चलाते, वे दुविधा में फंसे मनुष्य की चेतना को दिशा देते हैं।
फिर यह कैसी विडंबना है कि कृष्ण के नाम पर हम आज कर्म से अधिक जन्म की चर्चा कर रहे हैं? कृष्ण ने कर्म की बात की और हम जाति के प्रमाणपत्र खोज रहे हैं। कृष्ण ने विवेक की बात की और हम सोशल मीडिया की बहस में गालियों को तर्क समझ रहे हैं। कृष्ण ने संवाद का रास्ता दिखाया और हम एक-दूसरे को कृष्ण से बेदखल करने में लगे हैं। यह कृष्ण को समझना नहीं, कृष्ण के नाम का इस्तेमाल करना है।
महाभारत की परंपरा में कृष्ण युद्ध के लिए उतावले दिखाई नहीं देते। वे शांति का रास्ता तलाशते हैं, हस्तिनापुर जाते हैं और संघर्ष को टालने का प्रयास करते हैं लेकिन जब न्याय और समझौते की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं तो वे अन्याय के सामने खड़े होते हैं। इससे बड़ी राजनीतिक सीख आज के समय में क्या होगी? शांति का अर्थ कायरता नहीं और संघर्ष का अर्थ वीरता नहीं। पहले संवाद, फिर न्यायपूर्ण समाधान और जब अन्याय के सामने कोई रास्ता न बचे तो उसके विरुद्ध खड़े होने का साहस—कृष्ण की राजनीति को इस दृष्टि से भी समझना चाहिए।
शिशुपाल का प्रसंग भी कृष्ण के व्यक्तित्व के इसी पक्ष को सामने लाता है। परंपरा में शिशुपाल द्वारा बार-बार कृष्ण का अपमान करने और कृष्ण द्वारा लंबे समय तक धैर्य रखने की कहावत मिलती है, लेकिन सीमा समाप्त होने के बाद कृष्ण निर्णायक कार्रवाई करते हैं। इसका संदेश स्पष्ट है—सहनशीलता कमजोरी नहीं, लेकिन अन्याय को अनंतकाल तक सहते रहना भी कोई महानता नहीं। कृष्ण में धैर्य था तो निर्णय की शक्ति भी थी; करुणा थी तो कठोरता भी; प्रेम था तो संघर्ष का साहस भी।
इसीलिए कृष्ण को  माखन चोर ओर रसिया कहकर उनका चरित्रहनन करना बंद करो और उन्हें  युद्ध का नायक बना देना भी । भारतीय परंपरा में कृष्ण की बाल और किशोर लीलाओं की धार्मिक और भक्ति संबंधी व्याख्याएं रही हैं। उन्हें आधुनिक चश्मे से देखकर उनके पूरे व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना उस विराट सांस्कृतिक परंपरा को एक छोटे प्रसंग में सीमित कर देना है। कृष्ण को समझना है तो उनके पूरे व्यक्तित्व को देखना होगा—वह कृष्ण जो प्रेम करता है, मित्रता निभाता है, राजनीति समझता है, शांति चाहता है, अन्याय के सामने खड़ा होता है और संकट में पड़े मनुष्य का सारथी बनता है।
आज सबसे ज्यादा जरूरत इसी बात की है कि कृष्ण को जातीय श्रेष्ठता का व्यक्तित्व नहीं  बनाया जाए। यादव अहीर जाट गुर्जर को कृष्ण के नाम  लड़ाने की जरूरत नहीं  है । किसान और पशुपालक समाजों के बीच जितनी साझा सांस्कृतिक स्मृतियां हैं, उन्हें विभाजन की राजनीति में बदलना अपने ही इतिहास और सामाजिक शक्ति को कमजोर करना है।
हां, यदि कोई समुदाय अपने ऐतिहासिक संबंधों का दावा करता है तो वह शोध करे, प्रमाण प्रस्तुत करे, इतिहास के विद्वानों से संवाद करे और अपने तर्क को सामने रखे। लेकिन इतिहास की बहस गाली से नहीं जीती जाती। कृष्ण पर अधिकार जताने से कोई जाति महान नहीं हो जाती और कृष्ण को किसी दूसरी जाति से छीन लेने से अपनी जाति की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती।
यादव अहीर हो, जाट हो या गुर्जर—यदि इन समुदायों के भीतर किसान और पशुपालक श्रम की परंपरा रही है, तो उस श्रम को ही सम्मान का आधार बनाइए। अपने खेत पर गर्व कीजिए, अपने पशुओं पर गर्व कीजिए, अपने दूध  बेचने पर गर्व कीजिए, अपनी मेहनत पर गर्व कीजिए और अपनी स्वाभिमानी जीवन-पद्धति पर गर्व कीजिए। लेकिन यह गर्व दूसरे की मेहनत को छोटा करने लगे तो वह स्वाभिमान नहीं, अहंकार बन जाता है।
कृष्ण को अपना मानने का सबसे सुंदर तरीका यह नहीं कि हम घोषणा करें कि कृष्ण  हमारे थे, बल्कि यह है कि हम पूछें—क्या कृष्ण के विचार हमारे भीतर हैं? क्या हम कठिन समय में अपने कर्तव्य के साथ खड़े होते हैं? क्या हम अन्याय के सामने आवाज उठाते हैं? क्या हम संवाद और शांति को मौका देते हैं? क्या हम श्रम करने वाले व्यक्ति का सम्मान करते हैं? क्या हम अपने स्वाभिमान के साथ दूसरे के सम्मान की भी रक्षा करते हैं? अगर इन सवालों का जवाब हां है, तभी कृष्ण हमारे भीतर जीवित हैं।
कृष्ण की महानता किसी जाति प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं है।  यादव अहीर  उन्हें अपना माने,  गुर्जर  अपना माने, जाट अपना माने —लेकिन कोई भी यह अधिकार न जताए कि कृष्ण  उसी के हैं। कृष्ण जितने किसी समुदाय की आस्था हैं, उतने ही उन मूल्यों के भी हैं जिन्हें वे अपने जीवन और दर्शन से जोड़ते हैं।
और शायद यही वह जगह है जहां यादव अहीर, जाट और गुर्जर के बीच कृष्ण को लेकर विवाद समाप्त होकर एक नई एकता जन्म ले सकती है। यदि हम स्वयं को कर्मप्रधान किसान और श्रमशील समाज की परंपराओं से जोड़ते हैं तो कृष्ण को बांटने के बजाय उनके कर्मयोग को साझा आधार बनाएं। खेत गांव  क्षेत्रीय पहचानें अलग हो सकती हैं, सामाजिक इतिहास की अपनी-अपनी अपनी पहचान हो सकती हैं, लेकिन मेहनत की रोटी, पशुपालन का श्रम, किसान  और मजदूर का पसीना और स्वाभिमान की भाषा किसी एक जाति की बपौती नहीं है।
इसलिए यदि कोई ‘ग्वाला’ कहकर आपको नीचा दिखाने की कोशिश करे तो सिर झुकाने की जरूरत नहीं। मुस्कराकर कहिए—हां, हम ग्वाला रहे हैं, हमने पशु पाले हैं, दूध बेचा है, खेतों में मेहनत की है और अपने श्रम से जीवन खड़ा किया है। हमें अपने श्रम पर शर्म नहीं, गर्व है क्योंकि शर्म उस काम में नहीं होती जिससे ईमानदारी की रोटी मिलती है; शर्म उस मानसिकता में होती है जो मेहनत करने वाले इंसान को छोटा समझती है।
कृष्ण ने हमें यह नहीं सिखाया कि अपने जन्म पर अहंकार करो और दूसरे के जन्म को नीचा समझो। उन्होंने कर्म, विवेक, कर्तव्य और निर्णय की राह दिखाई इसलिए कृष्ण के नाम पर जातीय अहंकार खड़ा करना उनके संदेश को ही उलट देना है। यदि हम सच में कृष्ण को मानते हैं तो उनके कर्म को मानें, उनके विवेक को मानें, उनके साहस को मानें, उनके संवाद को मानें और उनके भीतर दिखाई देने वाले स्वाभिमान को अपने जीवन में उतारें।
यहाँ सवाल यह नहीं कि कृष्ण किस जाति के थे। बड़ा सवाल यह है कि हम कृष्ण से क्या सीख रहे हैं। क्या हम उन्हें जातियों के बीच बांटकर अपना-अपना झंडा ऊंचा करना चाहते हैं या उनके विचारों से समाज को जोड़ना चाहते हैं? क्या हम ‘ग्वाला’ शब्द को गाली बनाएंगे या उसे श्रम और स्वाभिमान का प्रतीक बनाएंगे? क्या हम यादव अहीर, जाट और गुर्जर को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करेंगे या उनकी साझा किसान-पशुपालक और कर्मप्रधान परंपराओं को सामाजिक शक्ति बनाएंगे?
कृष्ण को जाति की चारदीवारी में कैद मत कीजिए। उन्हें कर्म में खोजिए। उन्हें खेत में पसीना बहाते किसान में खोजिए। उन्हें पशु की सेवा करते पशुपालक में खोजिए। उन्हें ईमानदारी से दूध बेचकर घर चलाने वाले श्रमिक में खोजिए। उन्हें अन्याय के सामने खड़े होने वाले स्वाभिमानी मनुष्य में खोजिए। उन्हें उस व्यक्ति में खोजिए जो कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोता और शांति का रास्ता समाप्त होने तक संघर्ष को अंतिम विकल्प मानता है।
कृष्ण को बांटने से कृष्ण छोटे नहीं होंगे, लेकिन हम जरूर छोटे हो जाएंगे। कृष्ण किसी जाति की जागीर नहीं हैं। वे कर्म, विवेक, साहस, प्रेम, नीति और स्वाभिमान की एक विराट सांस्कृतिक चेतना हैं। इसलिए जातियों के नाम पर कृष्ण को खींचतान में मत बांटिए; उन्हें साझा विरासत बनने दीजिए क्योंकि जातियां कृष्ण को महान नहीं बनातीं—कृष्ण जैसे विराट व्यक्तित्व अपनी मेहनत, अपने कर्म और अपने चरित्र से उनसे जुड़ी पूरी परंपरा को सम्मान देते हैं। और शायद कृष्ण को समझने का सबसे सही रास्ता यही है कि यादव अहीर, जाट और गुर्जर उनके नाम पर एक-दूसरे से लड़ना बंद करें और उनके कर्म को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं।
डॉ. राजेंद्र यादव ‘आज़ाद’ मोबाइल 9414 27 1288

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